Friday, October 16, 2026

सिटीजन्स फोरम के तीसरे सम्मेलन में "देश का बदलता मिज़ाज और हम भारत के लोग" विषय पर पर्यावरणविद् व एडवोकेट डॉ. गोपाल कृष्ण द्वारा दिया गया वक्तव्य

सिटीजन्स फोरम के तीसरे सम्मेलन में "देश का बदलता मिज़ाज और हम भारत के लोग" विषय पर पर्यावरणविद् व एडवोकेट डॉ. गोपाल कृष्ण  द्वारा दिया गया वक्तव्य: 

अभी जो बात प्रियदर्शी जी ने जहां बात खत्म की थी वही से बात शुरू करता हूं... प्रियदर्शी जी अपनी बात समाप्त करते-करते एक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील का जिक्र कर रहे थे जो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के भी थे और अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के भी थे और एक समय में देश के चार पांच मंत्रालयों के मंत्री भी थे। अरुण जेटली जब 2002 में वाणिज्य मंत्री बने तो उन्होंने कंपनी कानून में संशोधन किया। कंपनी कानून में संशोधन करके ये व्यवस्था बनाई है कि कंपनियां अपने सालाना मुनाफेका 5% राजनीतिक दलों को चंदा दे सके। 2013 में 2011 का एक बिल इंट्रोड्यूस हुआ संसद में उसमें यह प्रावधान था कि 5% कायम रहेगा। लेकिन यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली संसद की वित्तीय समिति ने स्टैंडिंग कमेट फाइनेंस ने रेमेंड किया कि 5% से काम नहीं चल रहा है। इसको 7.5% कर दिया जाए। सरकार तत्कालीन यूपीए की थी। उन्होंने यह मान लिया कि कंपनियों से हम 7% ही चंदा लेंगे। बाकी उसी में काम हम 7.5% में ही चला लेंगे। बाद में अरुण जेटली ने 2017 में बजट भाषण में बड़ी ईमानदारी से संसद को और देश के नागरिकों को बताया कि हमारे दान दाता गुमनाम रहना चाहते हैं। और उन्होंने कहा कि हमने दान दाताओं की बात मान ली है। वो गुमनाम रह सकते हैं।  वही इलेक्ट्रोल बंड बन के आया। 2017 में कंपनी कानून में संशोधन करके ये व्यवस्था की गई कि कंपनियां असीमित और गुम चंदा दे सकती है। तो 7.5% का जो कैट था सीमा का हटा दिया गया। ये बात 2017 और 2018 की है। 

2024 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये जो इलेक्ट्रोल बॉन्ड वाला कंपनी कानून के तहत जो व्यवस्था बनी है वो असंवैधानिक था। जो असंवैधानिक घोषित हो गया तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा यह असंवैधानिक है लेकिन जिन जिन राजनीतिक दलों को चंदा मिला है वो चंदा अपने पास रख सकते हैं तो जिस इस काम के कारण विश्व के न्यायालयों के अदालत में हम लोगों की सर्वोच्च अदालत खड़ी है क्योंकि जब तक सत्ता दलों द्वारा लिया गया इलेक्ट्रॉन बाउंड का चंदा वापस नहीं आता है तब तक हर कानून और हर नीति जो देश में बन रही है उसी चंदे की पैदाइश है। इस पर कोई शक-सुबहा नहीं रहना चाहिए क्योंकि एक राजनीतिक सर्वसमति थी लेफ्ट राइट सेंटर तीनों पार्टियों की तीनों प्रकार के आइडियोलॉजीस के पॉलिटिकल कन्वेंशन में लगातार ये प्रस्ताव पारित होते रहे। वो  प्रस्ताव वो मौजूद है। पब्लिक डोमेन में है कि चुनाव सरकारी पैसे से होना चाहिए। कंपनियों के पैसे से नहीं। मैं इसी बात से शुरू करता हूं कि अरुण जेटली ने वो जो व्यवस्था बनाई वो व्यवस्था ही आगे चल रही है। हर नियम कानून जो नियुक्ति हुई गणेश ज्ञानेश कुमार की वो क्षमता के ही दबाव में हुआ है। ज्ञानेश कुमार को नियुक्त करने वालों का गणित कमजोर है। गणित कमजोर है। उनको गिनना नहीं आता है मतदाता। 

स्वप्नन दासगुप्ता जो बंगाल में मंत्री बन गए शायद वित्त मंत्री हैं उन्होंने एक लेख लिखा था उसमें  स्टालिन को याद किया और स्टालिन को याद करते हुए उन्होंने ज़िक्र किया कि डेमोक्रेसी इज नॉट अबाउट वोटिंग, लोकतंत्र, वोटिंग मतदान देने का नाम नहीं है। डेमोक्रेसी लोकतंत्र इज अबाउट काउंटिंग द वोट। वोट गिनने का नाम है लोकतंत्र और गिनने ही नहीं आ रहा है। पूरे देश में गणित कमजोर है और सरकार ये भी चाहती है कि लोगों का भी गणित और कमजोर हो जाए। तो इस प्रकार से जो बातें खुल रही है वो सब चंदा के ही दबाव में हो रहा है। 

रविंद्र नाथ राय जी बात कर रहे थे कि इस दौर में लोग आंदोलन करते-करते नाचने गाने लगे हैं। बर्टोल्ट ब्रेख्त ने कहा था-रघुपति सहाय ने उसका अनुवाद किया था कि "क्या जुल्मतों के दौर में भी गीत गाए जाएंगे? हां, जुल्मतों के दौर में जुल्मतों के ही गीत गाए जाएंगे।" और वो गाए जा रहे हैं। वो मुंबई में गाए जा रहे हैं। वो दिल्ली में गाए जा रहे हैं। पटना में गाए जा रहे हैं।  

आखरी दो बात मैं और कहूंगा कि 2014 में 10 सबसे अमीर लोग थे भारत में उनका नाम था: मुकेश अंबानी, दिलीप सांघवी, अजीम प्रेमजी, पलोनजी मिस्त्री, लक्ष्मी मित्तल, हिंदूजा ब्रदर्स, शिव नादर, गोदरेज फैमिली, बिरला, सुनील मित्तल-2014 के ये अरबपति थे, देश के अरबपति 2026 में कौन है उनका नाम मैं बोल रहा हूं-अडानी, अंबानी, जिंदल, लक्ष्मी मित्तल, सरस वाला, शिव नादर, दिलीप सांघवी, बिरला, हिंदुजा- कुछ बदलता ही नहीं, दो-चार नामों के अलावा। ये कैसी नीति अख्तियार कर रखी है कि कुछ बदलता ही नहीं है। 

बदलता इसलिए नहीं है क्योंकि कॉमन सेंस हावी हो रहा है। कॉमन सेंस के प्रतिरोध में ये जो नया मिजाज बन रहा है।उसी से गुड सेंस प्रिवेल करेगा ऐसा प्रतीत होता है। मिजाज का मतलब स्वभाव है। स्वभाव है मूल प्रवृत्ति। जनता की मूल प्रवृत्ति अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध की प्रवृत्ति है और वो स्थापित हो रही है। यह बदलाव स्वागत योग्य है। 

और आखिरी बात मैं कहूंगा कि जरूरी है नागरिकों का अपने अधिकारों के प्रति गंभीर होना। क्योंकि रोनाल्ड डार्किन एक न्याय शास्त्री है। कहते हैं कि यदि अपने अधिकारों को ले आप गंभीर नहीं है तो आप अपने आप को ले गंभीर नहीं है।

देश का बदलता मिज़ाज और हम भारत के लोग। सिटीजन्स फोरम का तीसरा सम्मेलन। 

https://youtu.be/4Qc3bD7G_mI?si=7s-slS0o4FioiENP

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