Monday, January 2, 2017

युआईडी/आधार आकड़े राष्ट्रीय धन है, जिसे विदेशी सरकारों को मुहैया कराया जा रहा है

डिजिटल उपनिवेशवाद को निमंत्रण देता डिजिटल इंडिया और बायोमेट्रिक युआईडी/आधार संख्या
 
युआईडी/आधार आकड़े राष्ट्रीय धन है, जिसे विदेशी सरकारों को मुहैया कराया जा रहा है

क्या धन के परिभाषा में “देश के आकड़े”, “निजी संवेदनशील सूचना” और “डिजिटल सूचना” शामिल नहीं है? भारत सरकार की बॉयोमेट्रिक्स समिति की रिपोर्ट “बॉयोमेट्रिक्स डिजाईन स्टैण्डर्ड फॉर युआईडी एप्लिकेसंस की अनुशंसा में कहा है कि “बॉयोमेट्रिक्स आकड़े राष्ट्रीय संपत्ति है और उन्हें अपने मूल विशिष्ट लक्षण में संरक्षित रखना चाहिए.”
क्या कोई राष्ट्र या कम्पनी या इन दोनों का कोई समूह अपनी राजनीतिक शक्ति का विस्तार “आकड़े” को अपने वश में कर के अन्य राष्ट्रों पर कर नियंत्रण कर सकता है?  
क्या “आकड़ो के खनन” से एक देश या एक कम्पनी या उनके संयुक्त प्रयास से किसी अन्य देश के संसाधनों को अपने हित में शोषण कर सकता है?
क्या “आकड़ो के गणितीय मॉडल” और डिजिटल तकनीक के गठजोड़ से गैर बराबरी और गरीबी और बढ़ सकती है और लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है?
क्या “संवेदनशील सूचना” के साइबर बादल (कंप्यूटिंग क्लाउड) क्षेत्र में उपलब्ध होने से देशवासियों और देश की संप्रभुता और सुरक्षा बढ़ती है?
क्या किसी भी डिजिटल पहल के द्वारा अपने भौगोलिक क्षेत्र के लोगों के ऊपर किसी दूसरे भौगोलिक क्षेत्र के तत्वों के द्वारा उपनिवेश स्थापित करने देना और यह मान्यता रखना कि यह अच्छा काम है, देश हित में है?
जब फेसबुक कंपनी के निदेशक समूह के मार्क अन्द्रेसन ने जब अपने लगभग पांच लाख ट्विटर साथियो को यह बताया कि “उपनिवेशवाद का विरोध भारतीय लोगो के लिए दशको से आर्थिक सत्यानाश का करना रहा है, अब क्यों रुके?” तो वेब दुनिया में हंगामा हो गया. फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग ने कहा कि वे अन्द्रेसन के विचारों से असहमत है. अन्द्रेसन ने इस टिप्पणी के वेब से मिटा दिया और इसके लिए माफ़ी भी मांगी. मगर बात इतने से ख़त्म नहीं होती है क्योकि डिजिटल कंपनियों का उपनिवेशवाद से सम्बन्ध नया नहीं है.
उपनिवेशवाद के प्रवर्तकों की तरह ही साइबरवाद और डिजिटल इंडिया के पैरोकार अपने आप को मसीहा के तौर पर पेश कर रहे है और बराबरी, लोकतंत्र और मूलभूत अधिकार के जुमलो का जाप और मंत्रोचारण कर रहे है. वे अपने मुनाफे के मूल मकसद को पर्दानशी कर छुपा रहे है. पूरी सूचना के संचार को रोक कर आधे-अधूरे सूचना को टुकड़ो में देश वासियों को परोस रहे है. स्थानीय सौदागरों और मुनाफे के हिस्सेदारों की यारी को साध कर  आलोचकों के डिजिटल उपनिवेशवाद के नीतिगत विरोध को देश विरोधी तय कर रहे है. ऐसा उपनिवेश काल में भी हो चुका है. वेब आधारित डिजिटल उपनिवेशवाद कोरी कल्पना नहीं है. यह उसका नया संस्करण है. वेब दुनिया एक नए प्रकार का साम्राज्य बन चुका है जो देश के कानून व्यवस्था, न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका को मोहित कर रही है और चुनौती भी दे रही है. वेब दुनिया और भौतिक जगत की ताकते एक नए साम्राज्यवाद को जन्म दे रही है.     
भारत के उपनिवेश बनने में सूचना और संचार माध्यम के योगदान पर आम तौर पर निगाह नहीं जाती. काफी समय से साम्राज्यों का अध्ययन उनके सूचना संचार का अध्ययन के रूप में प्रकट हुआ है. अब तो यह निष्कर्ष सामने आ गया है कि संचार का माध्यम ही साम्राज्य था. सूचना के अर्जन, प्रस्तुतीकरण, वर्गीकरण, प्रसुचीकरण और एकत्रीकरण और एकत्रित सूचना को पढ़ने और उसके आधार पर लिखने के अधिकार से ही साम्राज्य का निर्माण होता रहा है. जब-जब साम्राज्य ने अपने सूचना संचार बदलाव किया तब-तब साम्राज्य का स्वरुप बदला है.
भारत में भी पुस्तकालयों की परंपरा पुरानी है. विक्रमशिला, तक्षशिला और नालंदा के पुस्तकालयों की स्मृति अभी भी कायम है. साम्राज्यों के उत्थान और पुस्तकालयो के निर्माण में एक रिश्ता रहा है.
आर्क्सफोर्ड विश्वविद्यालय का विशाल पुस्तकालय 14वीं शताब्दी में स्थापित हुआ और कैंब्रिज विश्वविद्यालय का पुस्तकालय 15वीं शताब्दी के आरंभ में स्थापित हुआ था. ब्रिटेन में ब्रिटिश म्यूजियम नामक पुस्तकालय कि स्थापना सन्‌ 1753 में हुई। ब्रिटेन में पेटेंट आफिस के पुस्तकालय और साइंस लाइब्रेरी की स्थापना सन्‌ 1857 में हुई. गौर तलब है कि अपने देश में जनगणना कि शुरुवात सन्‌ 1872 में अंग्रेजी साम्राज्य ने अपने हित को साधने के किया था. अमेरिका के लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस की स्थापना वाशिंगटन में सन्‌ 1800 में हुई थी। यहाँ लगभग 2,400 कर्मचारी काम करते हैं। पुस्तकों और सूचना के अर्जन का इतिहास साम्राज्यों के इतिहास से जुड़ा है.
हर रोज अमेरिकी सरकार के 24 विभाग 191 देशो में 71, 000 लोगो कि मदद से 169 दूतावासों के 276 सुरक्षित महलों से आज के सूचना संचार आधारित साम्राज्य का कारोबार चलता है.  जनगणना से लेकर जनता के निजी संवेदनशील सूचना, उंगलियों के निशान, आँखों के पुतलियो के निशान, आवाज़ के सैंपल, DNA, मोबाइल, इन्टरनेट और साइबर बादल पर स्थित आकड़ो तक की जानकारी को एकत्रित और सूचीबद्ध करके साम्राज्य अपने आपको सुरक्षित और अपने अलावा सबको असुरक्षित कर रहा है.
सूचना प्रोद्योगिकी से सम्बंधित संसदीय समिति ने अपने एक रिपोर्ट में बताया है कि दुनिया में 20 प्रकार के साइबर अपराध के मामलो में भारत का स्थान पांचवा है. समिति ने अमेरिकी नेशनल सिक्यूरिटी एजेंसी द्वारा किये जा रहे ख़ुफ़िया हस्तक्षेप और विकिलिक्स के खुलासे और साइबर क्लाउड तकनीकी और वैधानिक खतरों के संबध में इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के तत्कालीन सचिव जे सत्यनारायणा (वर्तमान में चेयरमैन, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण, भारत सरकार) से पूछा था. संसदीय समिति उनके जवाब से संतुष्ट नहीं लगी. हैरत की बात ये सामने आई कि इन्हें विदेशी सरकारों और कम्पनियों द्वारा सरकारी लोगो और देशवासियों के अधि-आंकड़ा (मेटा डाटा) एकत्रित किये जाने से कोई परेशानी नहीं थी. इस सन्दर्भ में अधि आकड़ा के एकत्रीकरण का अर्थ है यह है कि संदेश के आगमन बिंदु, प्रस्थान बिंदु, संदेश का मंजिल और सदेश मार्ग के बारे में जानकारी को किसी ख़ुफ़िया संस्था द्वारा प्राप्त करना. इन्होने समिति को बताया कि भारत सरकार ने अमेरिकी सरकार से  स्पष्ट जिक्र किया है कि भारतीय दृष्टि से संदेश के सामग्री पर आक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जायेगा और  असहनीय माना जायेगा. यह तो तय है कि भारत सरकार और उनके अधिकारी उस अनाम शायर से भी गए गुजरे मालूम होते है जो कह गए है कि हम वो है जो ख़त का मज़मून भाप लेते है लिफाफा देख कर. सरकार के सचिव को लिफाफा दिखाने से परहेज नहीं है.   
ऐसे में सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड द्वारा इस उद्देश्य से क्लाउड प्लेटफॉर्म स्थापित कर डिजिटल इंडिया पहल के माध्यम से सरकार की बायोमेट्रिक युआईडी/आधार संख्या योजना सहित अन्य महत्त्वपूर्ण सेवाएं को और अधिक गति प्रदान करने का कार्यक्रम का तेजी से लागू किया जाना और उसका विस्तार करना बहुराष्ट्रीय डिजिटल कंपनियों के हितो को साधने में मदद देते प्रतीत होते है.
आज जब दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति यह दावा करते है कि उनके पास “सबसे लंबे समय तक की स्मृति” है उनका दावा डिजिटल कंपनियों के योगदान पर आधारित है. भारत सरकार को यह तो पता ही है कि ये कंपनिया अमरीकी देश हित में काम करने के लिए क़ानूनी तुरत पर बाध्य है.    
इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण सरकार किसी भी नागरिक के लिए आधार कार्ड लेना अधिदेशात्मक नहीं है” प्रचारित तो कर रही है मगर 639 संस्थानों में इसे “अधिदेशात्मक” अर्थात अनिवार्य बना दिया है और इसे रक्षा से जुड़े क्षेत्रो में भी लागू कर दिया है. इस कार्यक्रम को लागु करने में डिजिटल कंपनियों के योगदान के भयावह परिणाम हो सकते है क्योकि संधित अधिकारी सचेत नहीं प्रति होते है.
गौर तलब है कि भारत सरकार द्वारा बहुराष्ट्रीय डिजिटल कंपनियों के माध्यम को अपने संचार के लिए प्रयोग करने और “निजी संवेदनशील सूचना” आधारित बायोमेट्रिक युआईडी/आधार संख्या योजना के खिलाफ लंबित मामलो की सुनवाई में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री की भूमिका देश और देशवासियों के लिये अति महत्वपूर्ण हो गयी प्रतीत होती है. ऐसा सन्दर्भ डिजिटल उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया में ऐसे संस्थानों पर लोकतंत्र के पहरेदारो की पैनी निगाह और हस्तक्षेप की तार्किक बाध्यता प्रस्तुत कर रहा है. अब जबकि सितम्बर 14, 2016 के न्यायमूर्ति वि. गोपाला गौड़ा और आदर्श कुमार गोयल की खंडपीठ ने 5 जजों के संविधान पीठ के 15 अक्टूबर 2015 के आदेश को सातवी बार यह कहते हुए दोहराया कि युआईडी/आधार संख्या किसी भी कार्य के लिए जरूरी नहीं बनाया जा सकता है. इस मामले की सुनवाई को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टी .एस ठाकुर, न्यायाधीश . एम. खानविलकर और न्यायाधीश डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ के पीठ ने 9 सितम्बर को तय किया था. यह फैसला पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक विद्यार्थी कौंसिल द्वारा दी गयी चनौती के सन्दर्भ में आया है. इससे पहले पश्चिम बंगाल विधान सभा ने आधार के खिलाफ सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव भी पारित किया है.

यह पहली बार नहीं हुआ है कि सरकार इस प्रकार के आदेश को जारी करती है और फिर क़ानूनी चनौती मिलने पर उसे वापस लेती है.
सरकार ने चुनाव आयोग को भी भरमा कर ऐसे आदेश जारी करवा चुकी है. चुनाव आयोग को जब सूचित किया गया कि युआईडी/आधार संख्या पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश इसे गैर जरुरी है और इसकी वैधता पर सवालिया निशान लगा हुआ, आयोग ने 13 अगस्त, 2015 को अपना 27 फ़रवरी, 2015 के आदेश का संशोधन कर यह स्पष्ट किया कि मतदाता पहचान पत्र के लिए बायोमेट्रिक (यूनिक आइडेंटिफिकेशन) युआईडी/आधार संख्या जरूरी नहीं है। आयोग ने अपने आदेश में लिखा है कि आधार नंबर के एकत्रीकरण, भरण और उसे आयोग के डेटाबेस में बोने की क्रिया को तत्काल प्रभाव से बंद करना होगा और आगे से कोई भी आधार आकड़ा किसी भी संस्थान या डाटा हब से एकत्रित नहीं किया जायेगा. ऐसा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन करने के लिए किया गया. अब सबकी निगाह नए मुख्य न्यायाधीश पर टिकी है क्योकि डिजिटल उपनिवेशवाद को निमंत्रण देता डिजिटल इंडिया और बायोमेट्रिक युआईडी/आधार संख्या का भविष्य उन्हें ही तय करना है.
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For Details: Gopal Krishna, Citizens Forum for Civil Liberties (CFCL)*, Mb: 08227816731, 09818089660, E-mail-1715krishna@gmail.com
*Citizens Forum for Civil Liberties (CFCL) had appeared before the Parliamentary Standing Committee on Finance that examined the UID/Aadhaar Bill, 2010.
For more background information visit:
Repository of aadhaar related articles: aadhararticles.blogspot.com

Sunday, January 1, 2017

Happy New Year with Col.Lahiri at Home and an old snap at Dhulagargh


Recently I have traslated BUXA DUARER Bagh in Hindi.The book deal with Aborigin humanity and their day to day struggle for survival.Excellent experience.He was honoured in Behala Book Fair on new year eve in Dada`s mohalla but I could not join him because Sabita Bau was performing in Loksanskriti Bhava with Jagarani students and teacher Lipi Di.Rabindra Sangeet specialistDr.Kumar Chattopadhayay and Vishwanth Sur,the classical master were present at the occasion.Sabita publicly perfomed solo firs time.
It was a superb evening to see more than twenty children and Young girls performing so well.Thanks Lipidi.
Col.Lahiri with Pushpraj landed home at New Year morning.We spent nice day together.If publishers support,I would like to translate all good works in Hindi,Bengali and English.Other prominent works by COL.Lahiri are Excellent study on Netaji,Short story collection one and two,Military o anyano galpo,Duto Hasir Natak,a novel on army life,Agnipurush.I would like to introduce Col.Lahiri to Hindi dunia.
Dhulagarh is dragged in Communal riot for politics.My office Express Bhavan is situated there.I added a snap on Shabe Barat celebration on Dulahargh Majar.It isshocking for me that the peace hub has been boiled by politics.
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নৈরাজ্যের পরিকল্পনা ও শিখণ্ডী মোদিঃSaradendu Uddipan


নৈরাজ্যের পরিকল্পনা ও শিখণ্ডী মোদিঃSaradendu Uddipan writes on his FB wall
 বিজেপি এবং তার মাতৃ সংগঠন আরএসএস এর প্রত্যক্ষ মদতে এমএম কালবুর্গী হত্যা, অসহিষ্ণুতার কারণে শিল্পী সাহিত্যিকদের রাষ্ট্রীয় সম্মান ফেরত, রোহিত ভেমুলা হত্যা, রামজাদা-হারামজাদা ইস্যু, ইউনিভার্সিটিগুলির মধ্যে ভাগুয়া সন্ত্রাস, দুর্গা-মহিষাসুর দ্বৈরথ, গোমাতা, গোমূত্র, গোমাংস রাজনীতির কারণে একলাখ হত্যা এর প্রত্যেকটি ষড়যন্ত্রই রচিত হয়েছিল রাষ্ট্রকে চরম নৈরাজ্যের পথে ঠেলে দেবার জন্য। ব্রাহ্মন্যবাদ এই নৈরাজ্যের আবহাওয়াতেই ভাগুয়া সন্ত্রাসের উত্থান চাইছিল। আশার কথা যে এই ষড়যন্ত্রের প্রত্যেকটি ক্ষেত্রেই অসভ্য, বর্বর এই ভাগুয়া সন্ত্রাসীরা পর্যুদস্ত হয়েছে। ভারতের জাগ্রত জনগণের সংগঠিত প্রতিবাদে বিষদাঁত ভেঙ্গে গেছে এই দেশদ্রোহীদের। ভারতবর্ষের মধ্যে নৈরাজ্য এবং বিশৃঙ্খল পরিবেশ তৈরি করার কোন ত্রুটি রাখেনি এই বর্বর শক্তি। শিল্পী, সাহিত্যিক, সংখ্যালঘু, নারী, শিশু কাউকে রেয়াত করেনি এই নরপিশাচের দল। সন্ত্রাস সৃষ্টি করার জন্য ব্যবহার করেছে ধর্মাধর্ম, জাতপাত, দেশপ্রেমী-দেশদ্রোহী, ধর্ষণ, খুন, দাঙ্গা প্রভৃতি কৌশল। এই ভাবে একটু একটু করে ভারতবর্ষের মানুষকে বিভাজিত করে আক্রমণ নামিয়ে এনেছে দলিত-বহুজন মানুষের উপর। ফেক এনকাউন্টারে গুলি করে মারা হয়েছে আদিবাসী মহিলা ও শিশুদের। সিধু-কানুর মূর্তি ভেঙ্গে ফেলা হয়েছে। ভেঙ্গে ফেলা হয়েছে বাবা সাহেব বি আর আম্বেদকরের দাদারের ঐতিহাসিক বাড়ি। আর এই ক্ষেত্রেও লক্ষ লক্ষ মানুষ দলমত নির্বিশেষে, ধর্মাধর্মের বিভেদ ভুলে প্রতিবাদে সামিল হয়ে গুড়িয়ে দিয়েছে ব্রাহ্মন্যবাদীদের সমস্ত অপকৌশল। 
ব্রাহ্মন্যবাদীদের ষড়যন্ত্রের নক্কার জনক অধ্যায় ছিল গুজরাটের উনা। দেশজুড়ে চলছিল গোমাতার সন্তানদের সন্ত্রাস। যে ভাবে নিরীহ চর্মকারদের উপর প্রকাশ্যে পুলিশের মদতে নির্যাতন চালানো হয়েছিল তা হিটলারের নাৎসি বাহিনীকেও লজ্জা দিতে পারে। হ্যা ভারতের সচেতন মানুষ এ ক্ষেত্রেও গর্জে উঠেছিল দীপ্ত প্রতিবাদে। দলিত-বহুজনের সম্মিলিত প্রতিবাদে পদত্যাগ করতে বাধ্য হয়েছিল গুজরাটের মুখ্যমন্ত্রী। আর এইখানেই অশনি সংকেত দেখতে পেয়েছিল ব্রাহ্মন্যবাদী বর্বর রেজিমেন্ট। ওরা বুঝতে পেরেছিল বঙ্গোপসাগর থেকে আরবসাগর জুড়ে শুরু হয়েছে এক প্রবল নীল ঘূর্ণি ঝড়। তার আবহ সংবাদ ছড়িয়ে পড়ছে দিকে দিকে। দলিত-বহুজন সমাজকে এক সংহতির মঞ্চে এনে আগামী নির্বাচনগুলিতে এই ঘূর্ণি ঝড় গোটা ভারতবর্ষে আছড়ে পড়বে। চুরমার করে দেবে ব্রাহ্মন্যবাদী বিষবৃক্ষ। তাই দেরি না করে দেশের মানুষকে অর্থনৈতিক ভাবে পঙ্গু করে দেবার মরণ কামড় দিল ব্রাহ্মন্যবাদ।

মোদির এই নোটবন্দী এবং ভারতীয় খাজানা লুট সন্ত্রাস এবং নৈরাজ্য সৃষ্টির শেষ এপিসোড। তিনি আদানী, আম্বানী, বিজয় মাল্য, লোলিত মোদি, রামদেব, আশারাম, রবিশঙ্করদের মত ডিফল্টার এবং বড় চোরদের টাকা মুকুব করার জন্য জনগণের টাকা লুট করে রিজার্ভ ব্যাঙ্কে জমা করার ফন্দী আটলেন। অর্থনৈতিক অবরোধ করে দিলেন মানুষে উপর। তিনি চেয়েছিলেন মানুষ এই অবরোধের ফলে উশৃঙ্খল হয়ে উঠুক। দাঙ্গা, হাগামা, সন্ত্রাসের মধ্যে জড়িয়ে পড়ুক। বাজার লুট হোক, ব্যাঙ্ক লুট হোক, আগুন জ্বলুক। সেই অজুহাতে দেশে নেমে আসুক পরিকল্পিত নৈরাজ্য। আর এই নৈরাজ্যের মধ্যে উঠে আসুক মিলিটারী অভ্যুত্থান। মিলিটারী শাসন। সেই মত তিনি ভারতীয় সেনাদের প্রস্তুতও রেখেছিলেন। তিনজন পদাধিকারীকে ডিঙ্গিয়ে তার পছন্দের মানুষকে তুলে এনেছিলেন সেনা প্রধান হিসেবে।

আমরা অত্যন্ত গর্বিত যে, দেশের জাগ্রত বিবেক সম্পন্ন মানুষ মোদির ও তার দলের এই প্ররোচনায় পা না দিয়ে অসীম ধৈর্যের পরিচয় সাথে বর্বর ব্রাহ্মন্যবাদীদের রাষ্ট্রীয় সন্ত্রাসের পরিকল্পনাকে একেবারে নস্যাৎ করে দিয়েছেন। নিজেদের জীবনের মূল্যে তুলে ধরেছেন ভারতবর্ষের ত্যাগ, তিতিক্ষা ও সহনশীলতার বানী।

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डिजिटल हो जाओ।गुलामी दांव पर है तो गुलामगिरि का का होय? ओकर तो बावन इंच मोट सीना है।कांधा मोठा मजबूतै होय।अब बटाटा सस्ता हो कि महंगा हो कांदा,उस कांधे पर देश का बोझ है।जनता गउ ह।अर्थव्यवस्था कोल्ही का बैल।सांसद का है ,आप ही बोलो।उसकी लाठी,उसका माडिया।चूंचा किये बिना गुलामगिरि की सोच भइये। जनता बागी हो जाई तो गलामगिरि को बड़का खतरा। आधार का विरोध कोय ना करै जो डिजिटल आधार का फर्जी�

डिजिटल हो जाओ।गुलामी दांव पर है तो गुलामगिरि का का होय?

ओकर तो बावन इंच मोट सीना है।कांधा मोठा मजबूतै होय।अब बटाटा सस्ता हो कि महंगा हो कांदा,उस कांधे पर देश का बोझ है।जनता गउ ह।अर्थव्यवस्था कोल्ही का बैल।सांसद का है ,आप ही बोलो।उसकी लाठी,उसका माडिया।चूंचा किये बिना गुलामगिरि की सोच भइये।

जनता बागी हो जाई तो गलामगिरि को बड़का खतरा।

आधार का विरोध कोय ना करै जो डिजिटल आधार का फर्जीवाड़ा होवै।सूअरबाड़ा जिंदाबान।गुलामगिरि जिंदाबान।हिंदू राष्ट्र मा हिंदुत्व से आजादी कौन मांगे?

पलाश विश्वास

विरासत में गुलामी मिली है हजारोंहजार बरस की।यही गुलामी आखेर पूंजी है भारत के कैशलैस डिजिटल आम नागरिकों की।हालात लेकिन तेजी से बदलने लगे हैं।मालिकान ने खुदै गुलामी की पूंजी में पलीता लगा दिया है।पण होइहें वहींच जो राम रचि राखा।गुलामी बदस्तूर जारी है।जातपांत मजहब का कारोबार और आम जनता के बीच बंटवारा की सरहदें बदस्तूर सही सलामत है।गुलामगिरि सही सलामत है। इस गुलामी से छुटाकार किसे चाहिए,आजादी से आम जनता को भारी खौफ है।कहीं सचमुचै आजाद हो गयो तो गुलामगिरि का होगा?मनुस्मृति विधान के तहत गुलामी की सीढ़ी पकड़कर रोये हैं कि नया साल लाखो बरीस आवै,चाहे जावै जान भली, गुलामगिरि कबहुं ना जाये।कुलो किस्सा यहींंच है।मजहब यही है।सियासत भी यहींच।

बहुजनों में सबसे भारी ओबीसी।देश की आधी आबादी ओबीसी।देश की,सूबों की  सत्ता में ओबीसी।ढोर डंगरों की गिनती हुई रहै हैं,ओबीसी की गिनती कबहुं न होई।

मलाईदारों को चुन चुनकर राबड़ी बांटि रहे।आम ओबीसी किस्मत को रोवै हैं।कहत रहे बवाल धमाल मचाइके पुरजोर।कोटाभी फिक्स कर दियो।बलि।मंडल लागू कर दियो।मंडल ना मिलल।घंटा मिलल।मंडल समरस भयो।ओबीसी बजरंगी भाईजान। महात्मा फूले माता साबित्रीबाई का नाम जाप।अंबेडकर नाम जाप।धर्मदीक्षा भी हुई रहै नमो नमो बुद्धाय।गुलामगिरि की आदत ना छूटै।चादर दागी बा।फिर मिलल उ बंपर लाटरी का करोड़पति ख्वाब।वानरसेना को मिलल भीम ऐप।गुलामगिरि सलामत है।

यूपी जीतने को नोटबंदी फेल।पण ओबीसी कुनबे में मूसल पर्व जारी है।कभी महाभारत है तो रामायण कभी,कभी कैकयी का किस्सा।टीवी का फोकस वहींच।

जेएनयू के बारह छात्र निलंबित,खबर नइखे।नजीब कहां गइलन,खबर नइखै।जयभीम कामरेड गायब।रोहित वेमुला के तस्वीरो गायब।पलछिन पलछिन नयका नयका तमाशा।जूतम पैजार हुई रहा,पण थप्पड़वा अभी मारिहें कि तबहुं मारिहें।मारिबे जरुर।कबहुं तो मारबो।टीआरपी आसमान चूमै।फोकस वहींच।

नोटबंदी पर चर्चा उर्चा अब मंकी बातें।ओकर खूंटूी मा बंधा गउमाता रिजर्वबैंकवा।घर की मुर्गी भारतमाता वंदेमातरम।जब चाहे सर्जिकल स्ट्राइक।माइका लाल होवै जो सिडिशन मुठभेड़ छापे जांच के मुकाबले अंगद बन जाई।जब चाहै तब नियम कायदा कानून बदले देवै।गवर्नर ववर्नर एफएमवा कौन खेती की मूली?कारसेवा जारी बा।राम की सौगंध मंदिर वहींच बनावेक चाहि।जयभीम।गुलामगिरि सलामत।

बेशर्म गुलाम लोग का उखाड़ लीन्हे?

कबंधों का चेहरा नइखै,जान कौन फूकैं?

संसद को बायपास करके सुधार लागू होई रहा।

आधार भी लागू होई गयो सुप्रीम कोर्ट की ऐसी तैसी करके।

सियासत को ऐतराज नाही,जिसको ठेके पर देश है।काहे को सरदर्द?

हम अमेरिका बनै चाहै।ट्रंप ग्लबोल हिंदुत्व का भाग्य विधाता।

वहींच ट्रंपवा आज कहि रहे कंप्यूटर पर कोई भरोसा नइखे।सब हैक होवै रहे।कोई कंप्यूटर सेफ नाही।वे कहि रहे के कूरियर से चिठी भेजेक चाहि।ईमेलवा भी डेंजरस हो गइल।डिजिटल अमेरिका अनसेफ हो गइल।डिजिटल इंडिया शाइनिंग शाइनिंग।रुपै कार्ड से सबसे जियादा फर्जीवाड़े।अबहुं तीन करोड़ किसान के मत्थे रुपै।डिजिटल हो जाओ फिन चाहे थोक खुदकशी कर लो।बाबासाहेब ऐप है।डिजिटल हो जाओ।

सियासतबाज तमाम संसद मा खामोश वेतन भत्ता विदेश यात्राम में मशगुल।भौत खूब रहा कि उ संसद को गोली मारकर हिंदू ह्रदय सम्राट रेल बजट के जइसन बजट का भी काम तमामो कर दियो।पढ़े लिखे टैक्स छूट के अलावा बजट न समझें।टैक्स छूट नाही।पण बाकी बजट दिसंबर मा एडवांस होई गयो।

शर्म अगर सांसदों को होती तो संसद संविधान की रोज रोज हत्या के बाद इस्तीफा दे रहे होते।शिकन तक ना।फ्री मार्केटवा मा सांसद सभै मस्त मस्त।

ओकर तो बावन इंच मोट सीना है।कांधा मोठा मजबूतै होय।अब बटाटा सस्ता हो कि महंगा हो कांदा,उस कांधे पर देश का बोझ है।जनता गउ ह।अर्थव्यवस्था कोल्ही का बैल।सांसद का है ,आप ही बोलो।उसकी लाठी,उसका माडिया।चूंचा किये बिना गुलामगिरि की सोच भइये।जनता बागी हो जाई तो गलामगिरि को बड़का खतरा।

आधार का विरोध कोय ना करै जो डिजिटल आधार का फर्जीवाड़ा होवै।सूअरबाड़ा जिंदाबान।गुलामगिरि जिंदाबान।हिंदू राष्ट्र मा हिंदुतव से आजादी कौन मांगे?

युवराज नयका साल का जश्न मानवै रहै।बाकीर क्षत्रप सिपाहसालार सूबों की जंग मा बिजी होवै।बेशी तो रंगबिरंगे छापों से हैरान परेशान खामोश।

लखनऊ का दंगल नोटबंदी से सबसे बड़का राहत बा।बाकी देश मा अमंगल,यूपी लखनऊ मा मंगल ही मंगल।अमंगल मंगल।कैश भले  ना मिलल इंडिया डिजिटल बा।अंगूठा छाप दियो तो छप्पर फाड़कै सुनहले दिन बरसै।गुलामगिरि सही सलामत बा।फिर गमछा पहिनो के लुंगी पीन्दे,कि नंगा नाचै बीच बाजार,गुलामी सलामत बा।

टीवी शो फिर सास बहू संग्राम है।रियेलिटी शो जब्बर।बिग बास फेल है तो नोटबंदी फेलके जवाब ह ई रियलिटी शो।सबसे बड़ा शो।हजारोंहजार ऐंकर चीखै रहे ब्रेंकिंग न्यूज।बहुजन समाज ब्रेकिंग हो।ओबीसी आपसै मा सर फुटाव्वल मा बिजी।

दशरथ और राम वनवास तो फिर दशरथै को ही वनवास। का ट्विस्ट है स्टोरी मा धकाधक।उ निकार दियो।फिन रातोंरात वापल बुला भी लिया।खुदै निकल गये तो फिर निकार दियो। शकुनी मामा विदेश मा।सौतेली मां कैकई।बहुओं के बीच बाल नोचेंकै दंगल।टीपू और औरंगजेब को बख्शे नहीं ससुरे।गुलामी सलामत बा।

बाबासाबहेब अब भीम ऐप हैं जयभीम माइनस कामरेड।

सत्ता में साझेदारी खातिर,समता नियाय खातिर दलित मुसलमान वोटों पर दांव लगाये बैठे हैं।समरस नजारा है।फिन घड़ी घड़ी नोटों की वर्षा।केसरिया हुईू गयो सारी मोटर साईकिलें  साइकिलें।ट्रको भयो बजरंगी।बुरबकई की हद है।गुलामगिरि।

रामायण महाभारत या मुगलई किस्सा जो भी हो,बहुजनों में जोर मारकाट मची है और यूपी जीतने का रास्ता बजरंगी ब्रिगेड के लिए साफ करने की अंधी बजरंगी वानर दौड़ है कि कहीं यूपी में ससुरा हिंदुत्व का विजय रथ विकास यात्रा  थम गयो तो हिंदुत्व के नर्क से जिनगी को निजात मिलने की कोई सूरत बन गयी तो प्यारी प्यारी गुलामगिरि दांव पर।फिर अंधेरे के कारोबार का होई।सही सलामत रहे गुलामगिरि।

जाहिर है कि बहुजनों को आजादी न भावै।फिलहालओबासी दंगल भौते भावै।उससे ज्यादा भावै गुलामगिरि कि आजादी से बड़ा डर लागे।रोशनी से भी डरै हो।

नयका साल का जश्न बड़जोर रहा।पुरनका बोतलवा मा नयकी शराब परोस दियो वहींच मिनि बजट।वहींच सोशल स्कीम खातिर सरकारी खर्च की संजीवनी।

क्योंकि अर्थव्यवस्था को चूना लगा दियो है।नकदी बिना बाजर ठप बा।विकास दर घटि चली जाये।रुपया धड़ाम।रुपया गायब।छूमंतर।फिर भी बेस्टइवर कारपोरेय वकीलवा दहाड़ रहि हैं कि इंफ्लेशनवा कंट्रोल में है।खेती मानसून की किरपा पर बशर्ते कुछ बोया भी हो।बिजनेस भगवान भरोसे।उद्योगों का बंटाधार।उत्पादन गिरता जाये।बरेली के बाजार मा झूमका गिरल हो डिजिटल हो जाओ।सबको मिल जाई।डाके की सोचो मत।बचा का है जो लूट लिबो।बची गुलामगिरि है।जाको राखे साइयां,खत्म ना होवै।कसर बाकी न रहे,महाजनी सभ्यता में अब डिजिटल अंगूठा छाप हो जाओ।

मेहनकशों के हाथ काट दिये।बजरंगी बनियों की थाली में कर्ज परोस दियो।

बलि सूद घटि गयो रे।कारोबार काम धंधा चौपट।रोजगार कामधंधे चौपट। नौकरियों की छंटनी।जिनगी चटनी।भुखमरी की नौबत इधर तो उधर मंदी है।इनकम हैइइच नको।जमा पूंजी छिन लियो।बाजार से बेदखली के बाद अबहिं करज बढ़ाने और सूद घटाने का ख्वाबे बेचे बेशर्म सौदागर।गुलामगिरि सलामत चाहे कमामत आ जाये।

सौदागर भी दस दफा सोचे हैं।पुरनका माल नयका कहिकर गाहक फंसाने से पहले दस बार सोचे हैं।ई सौदागर अवतार ह।कल्कि अवतार ह।छप्पन इंच सीना।

सीनियर सिटिजनवा को ब्याज दर पहले सो जो था,वहींच है,मियां बीवी का खाता अलगे करके चूरण बांट दियो।

खाद्य के अधिकार में महिलाओं को पहिले से छह हजार मिलत रहे और शहरी ग्रामीण विकास परियोजनाओं में घर बनाने के लिए छूट पहिले से जारी है।

बैंकवा से ब्याज दरों में कटौती दिवालिया बैंकों के बच निकलने की जुगत है।डिजिटल विजिटल मा टैक्स भी लागू। कैश लिमिट वही 24 हजार।एटीएम खलास।

इस पर तुर्रा सब्सिडी की गैस का दाम भी बढ़ा दियो है।

पेट्रोल डीजल बिजली भाड़ा किराया फीस सब लगातार बढ़ोतरी पर।

अनाज दाल तेल से लेकर मांस मछली दूध शिक्षा चिकित्सा में जो भुगतान करना पड़ै,उस खातिर ना नोट मिलल,ना पचास दिनों की तपस्या के बाद कालाधन कहीं ससुरा निकलता दीख रहा है।

सजा भुगतने का संकल्प पानी में है।बार बार वायदा से मुकरना कहानी है।

ख्वाबों की फूलझड़ी पुरानी योजनाओं के परवचन में खिलखिलाये दियो।

सियासतबाज बल्लियों उछले हैं।सोना उछला,बाजार उछले हैं।

आम लोग उन सबसे कहीं जियादो उछलो है।केसरिया केसरिया बोलो।

सबसे जियादा ओबीसी बहुजन उछले हैं कि गुलामगिरि सौ टका सही सलामत।

सुनहले दिन आये गरयो रे।नया साल मुबारक हो।बदल दो वंदेमातरम,हिंदुत्व का नया नारा हैःडिजिटल होजाओ।गुलामी दांव पर है तो गुलामगिरि का का होय?