Thursday, July 16, 2015

ऐसे समाज और इंसानों को धिक्कार!!!A Dalit crushed in the thrasher Machine become viral in the social Media. Need prompt intervention for HR groups

Friends
Greetings !

The horrible news of " A Dalit  crushed in the thrasher Machine at lakhi Sarai ( Bihar) is viral in the social media but we did not get any news piece in to the any news paper Hindi or English till now after a lot of search.

We appeal to all please cross check and take up prompt action the issue on TOP PRIORITY !




ऐसे समाज और इंसानों को धिक्कार!!!

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कल सोशल साइट्स पर खबर मिली कि बिहार के लक्खीसराय जनपद के गाँव खररा में दलित मन्नू तांती को दबंगों ने अपने मजदूरी के पैसे मांगने पर जिन्दा गेहूँ निकालने वाले थ्रेसर में कूटपीस दिया। इस रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना को मीडिया ने कोई तवज्जो नहीं दी।इतनी बेरहमी और जघन्य तरीके से की गयी नृशंस हत्या पर मीडिया की चुप्पी शर्मनाक है। जिस मीडिया ने हेमामालिनी की गाड़ी से हुई दुर्घटना को जितनी हाइप दी उसका सौवाँ भाग भी इस जघन्य और अमानवीय घटना को नहीं दी। यही नहीं फेसबुक पर भी इक्कादुक्का लोगों ने इस घटना पर प्रतिक्रिया दी यह भी शर्मनाक ही है।

 

हम कैसे अमानवीय असभ्य और बर्बर समाज में रह रहे हैंदलित होने के कारण कितने जंगली व्यवहार को सहन कर रहे हैं यह हम दलित ही जानते हैंजहाँ अपने मजदूरी के पैसे मांगने पर जिन्दा थ्रेसर में ठूँस दिया जाता हो या गोली मार दी जाती होउस समाज की असभ्यता के आचरण को सहन करना इंसान के बस की बात नहीं है। यह भी अमानवीय है क्योंकि कोई भी इंसान किसी ऐसे अन्याय को सहन नहीं कर सकता। यह केवल दलित ही हैं जो सहन कर रहे हैं इसका एकमात्र कारण है इंसान होने का एहसास न होना क्योंकि एक हमारे जैसा ही हाड़मांस का इंसान हमें इंसान से कमतर जीवन जीने को बाध्य करता है जबकि वह हमसे ज्यादा मेहनत नहीं कर सकता। अगर दलित ठान ले कि मैं सामने वाले को एक ही बार में ढेर कर दूंगा तो कोई आँख उठाकर नहीं देख सकता,मगर अफसोस हम बात करने की बजाय गिड़गिड़ाते हैं। इसी कारण दुष्टों का दुस्साहस बढ़ जाता है और वह रोंद देते हैंकुचल देते हैं।


इस जघन्य हत्याकांड पर सरकार तो कानूनी खानापूर्ति कर लेगी मगर ‪#समाज कैसे कलंक को छुड़ा पायेगा?क्या दलित को समाज में मजदूरी नहीं मांगनी चाहिएक्या उसका और उसके बच्चों का पेट नहीं हैक्या उस वक्त समाज में उस दलित को बचा सकने वाले इंसान नहीं थे क्या तमाशबीन थे सभीसिर्फ उसके हत्यारे ही नहीं बल्कि ऐसे जघन्य हत्याकांड के तमाशबीन भी हत्यारे ही हैं जो मूकदर्शक बने रहते हैं।क्या उन तमाशबीनों का दिल ऐसे हत्याकांडों पर इंसानियत के लिए नहीं धड़कताअगर नहीं!!तो फिर वह इंसान कहलाने के लायक नहीं हैं।‪#धिक्कार है ऐसे समाज को और धिक्कार ऐसे इंसानों को जो इंसानियत के लिए नहीं धड़कते।----भास्कर----


.Arun Khote
On behalf of
Dalits Media Watch Team
(An initiative of "Peoples Media Advocacy & Resource Centre-PMARC")

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