Sunday, April 3, 2016

कब कहां सर पर गिरेगा आसमां, जमींदोज होगा कौन? जान माल की हिफाजत की फिक्र में महाबली बड़ाबाजार की तरह बाकी कोलकाता और बाकी बंगाल दहशत में है।मुख्यमंत्री भी। क्योंकि विकास की आंधी प्रोमोटर बिल्डर राज की मुनाफावसूली के सिवाय कुछ नहीं है,इस हकीकत से पहली बार बंगाल के लोगों का वास्ता बना है। बाकी देश भी स्मार्टशहरों के ख्वाब बुनते हुए असलियत समझने से पहले इसीतरह के हादसों का इंतजार कर रहा होगा।गजब अच्छे दिन हैं।कोई शक की गुंजाइश राष्ट्रद्रोह है।मेकिंग इन जारी है। एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास हस्तक्षेप

कब कहां सर पर गिरेगा आसमां, जमींदोज होगा कौन?


जान माल की हिफाजत की फिक्र में महाबली बड़ाबाजार की तरह बाकी कोलकाता और बाकी बंगाल दहशत में है।मुख्यमंत्री भी।


क्योंकि विकास की आंधी प्रोमोटर बिल्डर राज की मुनाफावसूली के सिवाय कुछ नहीं है,इस हकीकत से पहली बार बंगाल के लोगों का वास्ता बना है।


बाकी देश भी स्मार्टशहरों के ख्वाब बुनते हुए असलियत समझने से पहले इसीतरह के हादसों का इंतजार कर रहा होगा।गजब अच्छे दिन हैं।कोई शक की गुंजाइश राष्ट्रद्रोह है।मेकिंग इन जारी है।


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

हस्तक्षेप


स्मार्ट डिजिटल देश में बजट से लेकर शेयर बाजार तक विकास से लेकर राजनीति तक,सड़क से लेकर संसद तक प्रोमोटर बिल्डर सिंडिकेट माफिया राज के तहत किस भारत माता की जै जै कहकर कैसे अच्छे दिन आ गये हैं,तनिक कोलकाता के उन लोगों से आज ही पूछ लीजिये, जो बन चुके या अधबने फ्लाई ओवर, पुल, बहुमंजिली इंफ्रास्ट्रक्चर के अंदर बाहर कहीं रहते हैं।


यह अभूत पूर्व है गुरुवार को 2.2 किमी लंबे अधबने फ्लाईओवर के मलबे से अभी सरकारी तौर पर 24 लाशें निकली हैं और जख्मी भी सिर्फ 89 बताये जा रहे हैं।मारवाड़ी अस्पताल में कराहती मनुष्यता की कराहों से बड़ाबाजार की कारोबारी दुनिया दहल गयी है तो मलबे में दफन लावारिश लाशों की सड़ांध से बड़ाबाजार तो क्या पूरे कोलकाता की हवाएं और पानियां जहरीली हैं।रातदिन सारा हादसा लाइव चलते रहने और बाकी खतरों के खुलासे से यह दहशत अभी वायरल है।


खुद मुख्यमंत्री दहशतजदा है,जिनका बयान यह है ःदो दो फ्लाईओवर गिर गये हैं।ऐसे टेंडर पास हो गये कि धढ़ाधड़ ढह रहे हैं।लोग बेमौत मारे जा रहे हैं  और मुझे बहुत डर लगाता है जब मैं राजारहाट की तरफ जाती हूं कि कहीं फ्लाईओवर ढह न जाये।मेदिनीपुर के दांतन में दीदी का यह उद्गार है।


जाहिर है कि इन हादसों के लिए दीदी पिछली वाम सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही हैं।


जबकेि तथ्य बता रहे हैं कि हर निर्माणाधीन परियोजना में नई सरकार आने के बाद राजनीतिक वजह से फेरबदल हुआ है और हादसों की मुख्य वजहों में से यह भी एक वजह है।फिर जिन्हें टेंडर मिला,वे भी काम नहीं कर रहे हैं।


पुराने टेंडर की आड़ में सबकंट्राक्टर ही काम कर रहे हैं और वे कायदा कानून ताक पर रखकर काम कर रहे हैं और उन्हें किसी बात का कोई डर भी नहीं है क्योंकि वे सीधे तौर पर सत्तादल के बाहुबली हैं।बाकी मामला रफा दफा तो होना ही है.

मसलन पहले तो निर्माम संस्था दैवी कृत्य बता रही थी और अब अफसरों की गिरफ्तारी के बाद तोड़ फोड़ और धमाके की कथा बुनी और लाइव प्रसारित है।जाहिर है कि काली सूची में होने के बावजूद,अपने ही शहर और राज्य में प्रतिबंधित होने के बावजूदऐसी निर्माण संस्थाएं बाकी देश में तबाही मचाने के लिए आजाद है।


सत्ता या सियासत  को इस पर तबतक ऐतराज कोई ऐतराज नहीं होता जबतक सफाई देने की नौबत बनाने लायक लाशें किसी हादसे से न निकलें।फिर जिन्हें मुनाफावसूली के हजार तौर तरीके मालूम होते हैं,ले देकर मामला रफा दफा करने के हजार रास्ते भी उन्हें मालूम है।जबतक परदे पर खबर रहेगी,तब तकआफत होगी।फिर कोई बड़ा हादसा हुआ तो पुराना किस्सा खत्म।


इस निर्माण  की देखरेख तृणमूल संचालित कोललकाता नगर निगम के प्रोजेक्ट इंजीनियर कर रहे थे,बलि का बकरा खोजने के क्रम में ुनमें से दो निलंबित भी कर दिये गये है।कहा यह जा रहा कि हादसे से पहले हुई ढलाई के व्कत कोई इंजीनियर मौके पर नहीं था।जबकि हकीकत यह है कि अबाध प्रोमोटर बिल्डर माफिया राज में सरकारी या प्रशानिक निगरानी या देखरेख का कोई रिवाज नहीं है।मेकिंग इन की यह खुली खिड़की है।


इंजीनियर,अफसरान या प्रोमोटर बिल्डर भी नहीं,विकास के नाम ऐसी तमाम परियोजनाएं सीधे राजनीतिक नेताओं के मातहत होती हैं।पिर वे ही नेता अगर अपनी ही कंपनियों के मातहत ऐसी परियोजनाओं को अंजाम देते हों तो किसी के दस सर नहीं होते कि कटवाने को तैयार हो जाये।


बड़ा बाजार में यही हुआ।उन नेताओं के नाम भी सत्ता के गलियारे से ही सार्वजनिक है कि दूसरे प्रतिद्वंद्वी बिलडर प्रोमोटर राजनेता इस मौके का फायदा  उठायेंगे ही।यह स्वयंसिद्ध मामला है,लेकिन किसी एफआईआर या चार्जशीट में असल गुनाहगारों के नाम कभी नहीं होते।


जैसे बड़ाबाजार के तृणमूल के पूर्व वधायक व कद्दावर नेता के भाई इस परियोजना की निर्माण सामग्री की सप्लाई कर रहे थे।


हादसे से पहले तक बड़ा बाजार में ही उनके सिंडिकेट दफ्तर में कोलकाता जीत लेने की रणनीति बनाने में मसगुल ते सत्ता दल के नेता कार्यकर्ता।हादसे के बाद वह दफ्तर बंद है और बाईसाहेब भूमिगत हैं।


वे सतह पर बी होंगे तो कम से कम बंगाल पुलिस उन्हें हिरासत में लेने की हिम्मत नहीं कर सकती।


बलि के बकरे मिल गये तो आगे ऐसा विकास जारी रहना लाजिमी है।असली गुनाहगार तक तो  अंधे कानून के लंबे हाथ कभी पहुंचते ही नहीं हैं।


बकरों की तलाश है ।

जिसके गले की नाप का फंदा है,जाहिर है,फांसी पर वही चढ़ेगा।


ऐसे निर्माण विनिर्माण  का तकाजा जनहित भी नहीं है।सीधे ज्यादा से ज्यादा मुनाफावसूली है और काम पूरा होने की टाइमिंग वौटबैंक साधने के समीकरण से जुड़ी है।


जैसे कि बड़ा बाजार के इस फ्लाई ओवर के साथ हुआ।


मुख्यमंत्री का फतवा था कि मतदान से पहले फ्लाईओवर उद्घाटन के लिए तैयार हो जाना चाहिए।


खंभे माफिक नहीं थे।


सुरक्षा के लिए कोई एहतियात बरती नहीं गयी।


ढांचे के तमाम नाट बोल्ट खुले थे और महज रेत से भारी भरकम लोहे के ढांचे पर हड़बड़  में ढलाई कर दी गयी।


अभी डर यह है कि मलबा हटाने से बाकी हिस्से फ्लाईओवर के कहीं गिर न जाये या जैसे यह हिस्स गिरा ,वैसे ही दूसरा कोई हिस्सा कहीं गिर न जाये।इससे पहले आधीरात के बाद उल्टाडांगा में भी एक नया बना फ्लाई ओवर हाल में ढहा है,लेकिन सुनसान सड़क होने के कारण तब इतनी मौते नहीं हुई।


इस हादसे से उस हादसे की याद भी हो ताजा हो गयी है।


फ्लाई ओवर पर आने जाने वालों पर शायद कोई फ्रक पड़ता न हो,लेकिन इऩ फ्लाईओवरों के आसपास कोलकाता की घनी आबादी में कहां कहां घात लगाये मौत शिकार का इंतजार कर रही है,जान माल की हिफाजत की फिक्र में महाबली बड़ाबाजार की तरह बाकी कोलकाता और बाकी बंगाल दहशत में है।


क्योंकि विकास की आंधी प्रोमोटर बिल्डर राज की मुनाफावसूली के सिवाय़ कुछ नहीं है,इस हकीकत से पहली बार बंगाल के लोगों का वास्ता बना है।


बाकी देश भी स्मार्टशहरों के ख्वाब बुनते हुए असलियत समझने से पहले इसीतरह के हादसों का इंतजार कर रहा होगा।


गजब अच्छे दिन हैं,कोई शक की गुंजाइश राष्ट्रद्रोह है।

मेकिंग इन जारी है।


दीदी भले ही कोलकाता के इस हादसे की जिम्मेदारी से बचने के लिए ठेके देने का वक्त वाम शासन का 2009 बता रही हैं,वामदलों को इस बारे में खास कैफियत देने की जरुरत नहीं है क्योंकि गिरोहबंद तृणमूल के अपने प्रोमोटर नेता एक दूसरे को घेरने के फिराक में हैं।


इस इलाके के पूर्व विधायक संजयबख्शी को घेरने की पूरी तैयारी है तो सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने तो दावा ही कर दिया कि फ्लाईओवक के नक्शे में भारी खामियां थी ,जिसके बारे में उनने अपनी सरकार को आगाह कर दिया था।


मां माटी मानुष की सरकार ने आधा काम हो गया तो इसका श्रेयभी लूट लिया जाये,इस गरज से मौत का सर्कस जारी रखा।


अब कयास यह है कि मौत का सर्कस और कहां कहां चल रहा है।


इसी बीच इस अधबने अधगिरे फ्लाईओवर के आस पास पांच मकान भारी खतरे की वजह से खाली कराने का आदेश हुआ है जबकि निर्माणाधीन फ्लाईओवर के नीचे से सालों रात दिन ट्रेफिक बिना एहतियात चलती रही और कभी किसी खतरे से किसी को आगाह भी नहीं किया गया।


इस दमघोंटू माहौल में कोई अचरज नहीं कि दमदम एअर पोर्ट से सीधे मौके और अस्पताल में कुल मिलाकर आधे घंटे ही बिता सके राहुल गांधी और उनसे कहा कुछ भी नहीं गया।


उन्होंने पीड़ितों से मुलाकात की और प्रेस के सामने राजनीतिक बयान देने से साफ इंकार कर दिया है।


बड़ा बाजार जैसे इलाकों में सत्तर के दशक में नक्सल पुलिस मुठभेड़ों और राजनीतिक गृहयुद्ध के माहौल में कभी एक पटाखा भी नहीं फूटा।आजादी से पहले और आजादी के बाद बड़ाबाजार से कोलकाता और बंगाल की राजनीति चलती है।


इसी बड़ा बाजार इलाके में कटरा बाजारों और पुरानी इमारतों में अग्निकांड मौसमी बुखार जैसी सामान्यघटना है और बंगाल की राजनीति चलाने वाले इन लोगों की सेहत पर कोलकाता,बंगाल यादेश दुनिया की किसी भी हलचल का कोई असर कभी होता नहीं है।


मसलन बड़ा बाजार के एक फर्जी अखबार को एक राष्ट्रीय पार्टी ने पहले चरण के मतदान से पहले पेशगी बतौर बिना बात के नकद एक करोड़ रुपये नकद दे दिये सिर्फ इसलिए कि वह मुफ्त अखबार बांटकर उसके लिए बड़ा बाजार का समर्थन जुटाये।


ऐसे तमाम अखबार देश के हर बड़े शहर से निकलते हैं,जिनका धंधा घाटे में दिखाकर काले धन को सफेद करने का कारोबार चलता है।


इस अखबार के किसी पत्रकार गैर पत्रकार को अबी तक वेतन मिला नही है,जबसे यह अखबार निकला है।हर दो तीन महीने के भीतर कई संस्करणों वाले इस अखबार के कर्मचारी निकाल बाहर कर  दिये जाते हैं और अखबार भी अलग अलग प्रेस से छपता है।


मूल पूंजी भी किसी चिंटफंड का बताया जाता है।खबर है कि इस अखबार ने बिहार चुनाव में खासी कमाई की है और यूपी पंजाब लूटने की तैयारी है।इसका सारे पन्ने हिंदुत्व एजंडे को समर्पित हैं।


चूंकि उस राष्ट्रीय दल का कोई प्रवक्ता अखबार नहीं है तो कमसकम बड़ा बाजार को साधकर पूरे बंगाल की राजनीति हो ही है।




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Saturday, April 2, 2016

मुसलमान आजादी के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं? क्या अल्पसंख्यक समस्त समुदायों को उनकी आबादी के मुताबिक लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत प्रतिनिधित्व और समान अवसरमिल सकते हैं? पलाश विश्वास

क्या भारत के मुसलमान आजादी के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं?


क्या अल्पसंख्यक समस्त समुदायों को उनकी आबादी के मुताबिक लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत प्रतिनिधित्व और समान अवसरमिल सकते हैं?

पलाश विश्वास

उत्तर प्रदेश में निर्णायक चुनाव से पहले इस दौर में जिन पांच राज्यों बंगाल, तमिलनाडु,असम,केरल और पुडुचेरी में चुनाव हो रहे हैं,उन सभी में मुसलमान मतदाता कम से कम कुल मतदाताओं की एक चौथाई हैं।इनमें से सबसे ज्यादा असम में चौतीस फीसद वोटर मुसलमान हैं।


कश्मीर और लक्षद्वीप के बाद भारत में कहीं भी मुसलमान वोटर असम में सबसे ज्यादा हैं तो बंगाल,केरल और तमिलनाडु के चुनावों में भी मुसलमान वोटरों के वोटों से सत्ता के खेल में बाजी उलट पुलट हो सकती है।


क्या भारत के मुसलमान आजादी के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं?


क्या अल्पसंख्यक समस्त समुदायों को उनकी आबादी के मुताबिक लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत प्रतिनिधित्व और समान अवसरमिल सकते हैं?


इस सवाल के जवाब में हां या न कहने की कोई जरुरत नहीं है।1952 से लेकर अब तक विधानसभाओं और संसदीय चुनावों के नतीजे देख लीजिये।


इसी संसदीय प्रणाली में हिंदुत्व की राजनीति का भ्रूण है और धार्मिक ध्रूवीकरण के धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की जड़ें भी वही है।


चूंकि बहुसंख्य का जनमत इतना निर्णायक है कि अल्पसंख्यकों का मतामत निमित्तमात्र है तो अल्पसंख्यक भी बहुमत के साथ सत्ता में भागेदारी की राजनीति के तहत अपने हक हकूक की लड़ाई लड़ने का इकलौता विकल्प चुनने को मजबूर है।


यह मुसलमानों की ही नहीं,सिखों,ईसाइयों, बौद्धों से लेकर अछूतों और पिछड़ों की राजनीतिक मजबूरी है और इसीलिए मजहबी और जाति पहचान के तहत सारे समुदायअलग अलग गोलबंद हो रहे हैं।इसीलिए सियासत अब मजहबी है और इसी वजह से निरंतर मंडल कमंडल गृहयुद्ध है।


इसीलिए जाति उन्मूलन और धर्म निरपेक्षता पर लगातार लगातार विमर्श और आंदोलन के बावजूद हो उलट रहा है और वह इतना भयानक है कि राष्ट्रवाद अब मुकम्मल धर्मोन्माद है और जाति सत्ता की चाबी है।


स्वतंत्र मताधिकार चुनाव नतीजों में आता कही नहीं है।

आता तो जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व तय हो जाता।


अल्पसंख्यकों का वजूद ही सत्ता के रवैये पर निर्भर है।

इसीलिए धर्मोन्माद और जातिवाद के कैदगाह से मुक्ति का कोई रास्ता नजर नहीं आता है।क्योंकि सत्ता वर्ग के पास धर्मोन्माद और जातिवाद के तहत सत्ता पर अपना वर्चस्व कायम कऱने का इकलौता विकल्प है और सत्ता पलट का जो ख्वाब देखते हैं,उनके पास बी कोई दूसरा विकल्प नहीं है।


यही वजहहै कि सामाजिक आंदोलन में किसीकी कोई दिलचस्पी है ही नहीं और न हो सकती है और हर किसीकी कोशिश अंततः यही होती है कि सत्ता की राजनीति से नत्थी होकर अपने लिए और हद से हद अपने कुनबे के लिए अवसरों और संसाधनों का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा बटोर लिया जाये।तमाम क्रांतियों और भ्रांतियों, जनांदोलनों,प्रतिरोध और मसीहाई का अंतिम लक्ष्य यही है।


अब इस गुत्थी पर बहस करने के लिए भी किसीकी कोई दिलचस्पी नहीं हैक्योंकि मौजूदा सियासत शार्ट कट है कामयाबी का।सिर्प अपने माफिक समीकरण भिड़ा लें।


मसलन अगर हमारे पास पूंजी नहीं है।आजीविका नहीं है और न रोजगार है।मसलन हमारा चरित्र अगर समाजविरोधी धर्मविरोधी घनघोर अनैतिक है और हम राजनीतिक विकल्प चुनते हैं और उसमें कामयाबी भी मिलती है तो हमारे लिए न सिर्फ सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा है,बल्कि तमाम अवसर और संसाधन हमारे हैं और हम सीधे अरबपतियों और करोड़पतियों की जमात में है।


ये तमाम अवसर जाति और मजहब के नाम,भाषा और क्षेत्र के नाम वोटरों की गोलबंदी या वोटबैंक से संभव है।लोग वही कर रहे हैं।सामाजिक आंदोलन में जो त्याग,समर्पण और प्रतिबद्धता की जरुरत है,जो बदलाव का जुनून चाहिए,वह जिंदगी को बेहद मुश्किल बना देती है और उसके नतीजे व्यक्ति और परिवार के लिए बेहद घातक हो सकते हैं।


सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में सामाजिक आंदोलन के लिए अनिवार्यजन समर्थन जुटाना भी मुश्किल है।


सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में पूंजी अबाध है और सारा तंत्र ग्लोबल है,जिसका मुकाबला स्तानिक तौर तीरों से करना असंभव है।


सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में जनमत बनाने की कोई राह नहीं है।अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ उस हद तक है,सहिष्णुता की बाड़ेबंदी सिर्फ उस हद तक है,जहां तक आप रंगभेदी मनुस्मृति बंदोबस्त की जमींदारियों और रियासतों को चुनौती नहीं देते।


व्यवस्था चूंकि राष्ट्र से जुड़ी है और राष्ट्र चूंकि विश्व व्यवस्था का उपनिवेश है और कानून का राज कहीं नहीं है तो संविधान के प्रावधान लागू होते ही नहीं है और भिन्नमत के विरुद्ध डिजिटल निगरानी,तकनीकी नियंत्रण और सैन्यदमनतंत्र है तो आप व्यवस्था परिवर्तन के लिए संवाद बी नहीं कर सकते,आंदोलन तो दूर की कौड़ी है।


सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में वंचितों, पीड़ितों, बहिस्कृतों और मारे जाने को नियतिबद्ध बहुसंख्य जनगण भी जाति और धर्म के तिलिस्म में कैद है और हर नागरिक के लिए अलहदा अलहदा चक्रव्यूह है।जिससे बच निकलने के लिए या जिसे तोड़ने का कोई मंत्र हमने सीखा नहीं है और हमारे सारे मंत्र ओ3म स्वाहा के समर्पण का स्थाईभाव है।


तो बचाव का रास्ता आम लोगों के लिए बहुत सरल है कि जीतने वालों का साथ दो और उनसे मौकों की उम्मीद करो और अच्छे दिनों की उम्मीद में जैसे तैसे चादर खींचखांचकर टल्लीदार चिथड़ा चिथड़ा जिंदगी जीने का विकल्प चुन लो।


चुनावों में यही होता है कि जो बदलाव कर सकते हैं,जैसे मुसलमान,जैसे सिख,जैसे आदिवासी,जैसे पिछड़े , जैसे रंगबिरंगे शरणार्थी,जैसे जल जंगल जमीन से बेदखल लोग,जैसे दलित वे सारे के सारे अलग अलग मोबाइल वोटबैंक है और वे जीतने वाली पार्टी का दमन पकड़कर किसी तरह नागरिक और मानवाधिकार के बिना जी लेने का समझौता कर लेने को मजबूर है।


यानी बालिग मताधिकार का वास्तव में इस्तेमाल हो ही नहीं सकता।होता तो हम भारतीय आजाद नागरिक चोरों,डकैतों,भ्रष्टों,हत्यारों,बलात्कारियों,गुंडों वगैरह वगैरह को चुन नहीं रहे होते और वे ही लोग मंत्री से संतरी तक के पदों पर काबिज नहीं हो रहे होते।बाहुबलियों और धनपशुओं के हाथों लोकतंत्र,देश और समूचा कायनात बिक नहीं रहा होता।


सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में सारे माध्यम,सारी विधायें और यहां तक की सारे लोकरंग राजनीति से नत्थी है और एकाधिकार राजनीतिक हितों के खिलाफ जनता के पक्ष में, पीड़ितों, उत्पीड़ितों, वंचितों, गरीबों, मेहनतकशों के पक्ष में,बच्चों और स्त्रियों के पक्ष में कुछ भी नहीं है और ये तमाम सामाजिक वर्ग और शक्तियां निःशस्त्र असहाय है और राष्ट्र,व्यवस्था और निरंकुश सत्ता की मार से बचने के लिए संरक्षक माई बाप मसीहा राजनेताओं का पक्ष चुनने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है।


भारतीय संविधान में स्वतंत्र बालिग मताधिकार का प्रावधान है।दरअसल आजादी से पहले गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट 1919 और 1935 के  सिखों के स्वतंत्र मातधिकार समेत विभिन्न प्रावधानों के तहत संसदीय प्रणाली के तहत जनप्रतिनिधित्व की मौजूदा प्रणाली की नींव पड़ी।इससे पहले इंग्लैंड में समस्त बालिग नागरिकों को मताधिकार दे दिया गया।बाबासाहेब अंबेडकर ने अछूतों के लिए स्वतंत्र माताधिकार मांगे तो पुणे करार के तहत इस मांग का पटाक्षेप हो गया और नतीजतन भारतीय संविधान के तहत बाद में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के और फिर मंडल आयोग के मार्फत पिछड़ों को भी आरक्षण दे दिया गया।


गौरतलब है कि बालिग मताधिकार ने सभी नागरिकों को समानता और न्याय के लिए लोकतांत्रिक प्रणाली का विकल्प दिया और इसीके नतीजतन गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट भारत में लागू होने से पहले अस्पृश्यता के तहत हजारों सालों से बहुसंख्य शूद्रों और अछूतों को मनुस्मृति अनुशासन के तहत हिंदुत्व की पहचान से जो वंचित रखा गया,उसे भारत के हिंदू नेताओं ने हिंदू समाज के लिए घातक माना और इसी के तहत हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे गांधीजी ने भी हिंदू समाज की बंटवारे की आशंका से अछूतों के लिए स्वतंत्र मताधिकार की मांग को कारिज कर दिया।


जाहिर है कि शूद्रों और अछूतों को पहलीबार हिंदू समाज का अंग मान लिया गया क्योंकि इस्लामी राष्ट्रीयता का मुकाबला विशुद्ध हिंदुत्व के जरिये करना असंभव था।अगर अछूत और शूद्र हिंदू नहीं माने जाते तो सवर्ण हिंदू समाज मुसलमानों के मुकाबले अल्पसंख्यक ही होता और तब स्वतंत्र मताधिकार के तहत सत्ता पर सवर्णों का कोई दावा ही नहीं बनता।


बालिग मताधिकार का मुकाबला करने के लिए इस्लामी राष्ट्रीयता के मुकाबले विशुद्धतावादी ब्राहमणवादी हिंदुत्व ने अछूतों समेत तमाम शूद्रों को लेकर व्यापक हिंदू समाज की रचना करके हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना की,जिसमें बाद में आदिवासियों के हिंदूकरण का एजंडा भी शामिल हो गया और बिना मांगे आदिवासियों को आरक्षण दे दिया गया।


इसका नतीजा निरंकुश हिंदुत्व करण और हिंदू राष्ट्र है और आज देश के हालात,ये धर्मोन्मादी घृणा और हिंसा का माहौल,यह मुक्तबाजार,मंडल कमंडल गृहयुद्ध वगैरह वगैरह हैं।


इन सबको बदलने के लिए एक ही विकल्प समाजिक आंदोलन का है और हालात दिनोंदिन बिगड़ इसीलिए रहे हैं कि हमारे पास फिलहाल कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है।गिरोहबंद धर्मोन्मादी और अस्मितावादी राजनीति में हम लोकतंत्र का उत्सव मना रहे हैं।जिससे हम नर्क ही जी रहे हैं या जीविक सशरीर स्वरगवास कर रहे हैं।


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कब कहां सर पर गिरेगा आसमां, जमींदोज होगा कौन? जान माल की हिफाजत की फिक्र में महाबली बड़ाबाजार की तरह बाकी कोलकाता और बाकी बंगाल दहशत में है।मुख्यमंत्री भी। क्योंकि विकास की आंधी प्रोमोटर बिल्डर राज की मुनाफावसूली के सिवाय कुछ नहीं है,इस हकीकत से पहली बार बंगाल के लोगों का वास्ता बना है। बाकी देश भी स्मार्टशहरों के ख्वाब बुनते हुए असलियत समझने से पहले इसीतरह के हादसों का इंतजार कर रहा होगा।गजब अच्छे दिन हैं।कोई शक की गुंजाइश राष्ट्रद्रोह है।मेकिंग इन जारी है। एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास हस्तक्षेप


क्या भारत के मुसलमान आजादी के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं?


क्या अल्पसंख्यक समस्त समुदायों को उनकी आबादी के मुताबिक लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत प्रतिनिधित्व और समान अवसरमिल सकते हैं?

पलाश विश्वास

उत्तर प्रदेश में निर्णायक चुनाव से पहले इस दौर में जिन पांच राज्यों बंगाल, तमिलनाडु,असम,केरल और पुडुचेरी में चुनाव हो रहे हैं,उन सभी में मुसलमान मतदाता कम से कम कुल मतदाताओं की एक चौथाई हैं।इनमें से सबसे ज्यादा असम में चौतीस फीसद वोटर मुसलमान हैं।


कश्मीर और लक्षद्वीप के बाद भारत में कहीं भी मुसलमान वोटर असम में सबसे ज्यादा हैं तो बंगाल,केरल और तमिलनाडु के चुनावों में भी मुसलमान वोटरों के वोटों से सत्ता के खेल में बाजी उलट पुलट हो सकती है।


क्या भारत के मुसलमान आजादी के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं?


क्या अल्पसंख्यक समस्त समुदायों को उनकी आबादी के मुताबिक लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत प्रतिनिधित्व और समान अवसरमिल सकते हैं?


इस सवाल के जवाब में हां या न कहने की कोई जरुरत नहीं है।1952 से लेकर अब तक विधानसभाओं और संसदीय चुनावों के नतीजे देख लीजिये।


इसी संसदीय प्रणाली में हिंदुत्व की राजनीति का भ्रूण है और धार्मिक ध्रूवीकरण के धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की जड़ें भी वही है।


चूंकि बहुसंख्य का जनमत इतना निर्णायक है कि अल्पसंख्यकों का मतामत निमित्तमात्र है तो अल्पसंख्यक भी बहुमत के साथ सत्ता में भागेदारी की राजनीति के तहत अपने हक हकूक की लड़ाई लड़ने का इकलौता विकल्प चुनने को मजबूर है।


यह मुसलमानों की ही नहीं,सिखों,ईसाइयों, बौद्धों से लेकर अछूतों और पिछड़ों की राजनीतिक मजबूरी है और इसीलिए मजहबी और जाति पहचान के तहत सारे समुदायअलग अलग गोलबंद हो रहे हैं।इसीलिए सियासत अब मजहबी है और इसी वजह से निरंतर मंडल कमंडल गृहयुद्ध है।


इसीलिए जाति उन्मूलन और धर्म निरपेक्षता पर लगातार लगातार विमर्श और आंदोलन के बावजूद हो उलट रहा है और वह इतना भयानक है कि राष्ट्रवाद अब मुकम्मल धर्मोन्माद है और जाति सत्ता की चाबी है।


स्वतंत्र मताधिकार चुनाव नतीजों में आता कही नहीं है।

आता तो जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व तय हो जाता।


अल्पसंख्यकों का वजूद ही सत्ता के रवैये पर निर्भर है।

इसीलिए धर्मोन्माद और जातिवाद के कैदगाह से मुक्ति का कोई रास्ता नजर नहीं आता है।क्योंकि सत्ता वर्ग के पास धर्मोन्माद और जातिवाद के तहत सत्ता पर अपना वर्चस्व कायम कऱने का इकलौता विकल्प है और सत्ता पलट का जो ख्वाब देखते हैं,उनके पास बी कोई दूसरा विकल्प नहीं है।


यही वजहहै कि सामाजिक आंदोलन में किसीकी कोई दिलचस्पी है ही नहीं और न हो सकती है और हर किसीकी कोशिश अंततः यही होती है कि सत्ता की राजनीति से नत्थी होकर अपने लिए और हद से हद अपने कुनबे के लिए अवसरों और संसाधनों का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा बटोर लिया जाये।तमाम क्रांतियों और भ्रांतियों, जनांदोलनों,प्रतिरोध और मसीहाई का अंतिम लक्ष्य यही है।


अब इस गुत्थी पर बहस करने के लिए भी किसीकी कोई दिलचस्पी नहीं हैक्योंकि मौजूदा सियासत शार्ट कट है कामयाबी का।सिर्प अपने माफिक समीकरण भिड़ा लें।


मसलन अगर हमारे पास पूंजी नहीं है।आजीविका नहीं है और न रोजगार है।मसलन हमारा चरित्र अगर समाजविरोधी धर्मविरोधी घनघोर अनैतिक है और हम राजनीतिक विकल्प चुनते हैं और उसमें कामयाबी भी मिलती है तो हमारे लिए न सिर्फ सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा है,बल्कि तमाम अवसर और संसाधन हमारे हैं और हम सीधे अरबपतियों और करोड़पतियों की जमात में है।


ये तमाम अवसर जाति और मजहब के नाम,भाषा और क्षेत्र के नाम वोटरों की गोलबंदी या वोटबैंक से संभव है।लोग वही कर रहे हैं।सामाजिक आंदोलन में जो त्याग,समर्पण और प्रतिबद्धता की जरुरत है,जो बदलाव का जुनून चाहिए,वह जिंदगी को बेहद मुश्किल बना देती है और उसके नतीजे व्यक्ति और परिवार के लिए बेहद घातक हो सकते हैं।


सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में सामाजिक आंदोलन के लिए अनिवार्यजन समर्थन जुटाना भी मुश्किल है।


सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में पूंजी अबाध है और सारा तंत्र ग्लोबल है,जिसका मुकाबला स्तानिक तौर तीरों से करना असंभव है।


सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में जनमत बनाने की कोई राह नहीं है।अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ उस हद तक है,सहिष्णुता की बाड़ेबंदी सिर्फ उस हद तक है,जहां तक आप रंगभेदी मनुस्मृति बंदोबस्त की जमींदारियों और रियासतों को चुनौती नहीं देते।


व्यवस्था चूंकि राष्ट्र से जुड़ी है और राष्ट्र चूंकि विश्व व्यवस्था का उपनिवेश है और कानून का राज कहीं नहीं है तो संविधान के प्रावधान लागू होते ही नहीं है और भिन्नमत के विरुद्ध डिजिटल निगरानी,तकनीकी नियंत्रण और सैन्यदमनतंत्र है तो आप व्यवस्था परिवर्तन के लिए संवाद बी नहीं कर सकते,आंदोलन तो दूर की कौड़ी है।


सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में वंचितों, पीड़ितों, बहिस्कृतों और मारे जाने को नियतिबद्ध बहुसंख्य जनगण भी जाति और धर्म के तिलिस्म में कैद है और हर नागरिक के लिए अलहदा अलहदा चक्रव्यूह है।जिससे बच निकलने के लिए या जिसे तोड़ने का कोई मंत्र हमने सीखा नहीं है और हमारे सारे मंत्र ओ3म स्वाहा के समर्पण का स्थाईभाव है।


तो बचाव का रास्ता आम लोगों के लिए बहुत सरल है कि जीतने वालों का साथ दो और उनसे मौकों की उम्मीद करो और अच्छे दिनों की उम्मीद में जैसे तैसे चादर खींचखांचकर टल्लीदार चिथड़ा चिथड़ा जिंदगी जीने का विकल्प चुन लो।


चुनावों में यही होता है कि जो बदलाव कर सकते हैं,जैसे मुसलमान,जैसे सिख,जैसे आदिवासी,जैसे पिछड़े , जैसे रंगबिरंगे शरणार्थी,जैसे जल जंगल जमीन से बेदखल लोग,जैसे दलित वे सारे के सारे अलग अलग मोबाइल वोटबैंक है और वे जीतने वाली पार्टी का दमन पकड़कर किसी तरह नागरिक और मानवाधिकार के बिना जी लेने का समझौता कर लेने को मजबूर है।


यानी बालिग मताधिकार का वास्तव में इस्तेमाल हो ही नहीं सकता।होता तो हम भारतीय आजाद नागरिक चोरों,डकैतों,भ्रष्टों,हत्यारों,बलात्कारियों,गुंडों वगैरह वगैरह को चुन नहीं रहे होते और वे ही लोग मंत्री से संतरी तक के पदों पर काबिज नहीं हो रहे होते।बाहुबलियों और धनपशुओं के हाथों लोकतंत्र,देश और समूचा कायनात बिक नहीं रहा होता।


सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में सारे माध्यम,सारी विधायें और यहां तक की सारे लोकरंग राजनीति से नत्थी है और एकाधिकार राजनीतिक हितों के खिलाफ जनता के पक्ष में, पीड़ितों, उत्पीड़ितों, वंचितों, गरीबों, मेहनतकशों के पक्ष में,बच्चों और स्त्रियों के पक्ष में कुछ भी नहीं है और ये तमाम सामाजिक वर्ग और शक्तियां निःशस्त्र असहाय है और राष्ट्र,व्यवस्था और निरंकुश सत्ता की मार से बचने के लिए संरक्षक माई बाप मसीहा राजनेताओं का पक्ष चुनने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है।


भारतीय संविधान में स्वतंत्र बालिग मताधिकार का प्रावधान है।दरअसल आजादी से पहले गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट 1919 और 1935 के  सिखों के स्वतंत्र मातधिकार समेत विभिन्न प्रावधानों के तहत संसदीय प्रणाली के तहत जनप्रतिनिधित्व की मौजूदा प्रणाली की नींव पड़ी।इससे पहले इंग्लैंड में समस्त बालिग नागरिकों को मताधिकार दे दिया गया।बाबासाहेब अंबेडकर ने अछूतों के लिए स्वतंत्र माताधिकार मांगे तो पुणे करार के तहत इस मांग का पटाक्षेप हो गया और नतीजतन भारतीय संविधान के तहत बाद में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के और फिर मंडल आयोग के मार्फत पिछड़ों को भी आरक्षण दे दिया गया।


गौरतलब है कि बालिग मताधिकार ने सभी नागरिकों को समानता और न्याय के लिए लोकतांत्रिक प्रणाली का विकल्प दिया और इसीके नतीजतन गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट भारत में लागू होने से पहले अस्पृश्यता के तहत हजारों सालों से बहुसंख्य शूद्रों और अछूतों को मनुस्मृति अनुशासन के तहत हिंदुत्व की पहचान से जो वंचित रखा गया,उसे भारत के हिंदू नेताओं ने हिंदू समाज के लिए घातक माना और इसी के तहत हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे गांधीजी ने भी हिंदू समाज की बंटवारे की आशंका से अछूतों के लिए स्वतंत्र मताधिकार की मांग को कारिज कर दिया।


जाहिर है कि शूद्रों और अछूतों को पहलीबार हिंदू समाज का अंग मान लिया गया क्योंकि इस्लामी राष्ट्रीयता का मुकाबला विशुद्ध हिंदुत्व के जरिये करना असंभव था।अगर अछूत और शूद्र हिंदू नहीं माने जाते तो सवर्ण हिंदू समाज मुसलमानों के मुकाबले अल्पसंख्यक ही होता और तब स्वतंत्र मताधिकार के तहत सत्ता पर सवर्णों का कोई दावा ही नहीं बनता।


बालिग मताधिकार का मुकाबला करने के लिए इस्लामी राष्ट्रीयता के मुकाबले विशुद्धतावादी ब्राहमणवादी हिंदुत्व ने अछूतों समेत तमाम शूद्रों को लेकर व्यापक हिंदू समाज की रचना करके हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना की,जिसमें बाद में आदिवासियों के हिंदूकरण का एजंडा भी शामिल हो गया और बिना मांगे आदिवासियों को आरक्षण दे दिया गया।


इसका नतीजा निरंकुश हिंदुत्व करण और हिंदू राष्ट्र है और आज देश के हालात,ये धर्मोन्मादी घृणा और हिंसा का माहौल,यह मुक्तबाजार,मंडल कमंडल गृहयुद्ध वगैरह वगैरह हैं।


इन सबको बदलने के लिए एक ही विकल्प समाजिक आंदोलन का है और हालात दिनोंदिन बिगड़ इसीलिए रहे हैं कि हमारे पास फिलहाल कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है।गिरोहबंद धर्मोन्मादी और अस्मितावादी राजनीति में हम लोकतंत्र का उत्सव मना रहे हैं।जिससे हम नर्क ही जी रहे हैं या जीविक सशरीर स्वरगवास कर रहे हैं।


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Friday, April 1, 2016

Washington voices Kashmir dissidence! Would America be considered as anti Hindu,anti India? Palash Biswas


Washington voices Kashmir dissidence!

Would America be considered as anti Hindu,anti India?

Palash Biswas

Washington voices Kashmir dissidence.Would America be considered as anti Hindu,anti India?Is it the neat result of Doval hi fi visit to Washington?


Indian Prime Minister landed in Washington yet again to cement Indo US relations afresh.He is speaking the language of the Global hegemony as Kashmir stad off reminds us about the rot within.Mind you,Members of separatist Kashmiri groups held a demonstration in front of the Washington DC Convention Centre Thursday afternoon.


Separatist Kashmiri groups protested near venue of the Nuclear Security Summit here which is being attended by leaders from more than 50 countries including Prime Minister Narendra Modi.Members of separatist Kashmiri groups held a demonstration in front of the Washington DC Convention Centre Thursday afternoon, seeking the world leaders' intervention to resolve the Kashmir issue.


RSS shares power with PDF which considers Afjal Guru a martyr while RSS controlled government brands everyone anti national whoever voices the grievances of the people in the valley as civic and human rights violated daily without any question.


Our students concerned with unity and integrity of India and engaged in democrat discourse to break through the mess created by vested political game are persecuted in our universities and institutions.


But the voices from Kashmir which are not allowed to be raised in rest of India,expressed freely in America which boasts to be the best friend of India and the Indian Prime Minister is said to be enjoying personal chemistry with the US President.


Well,Prime Minister Narendra Modi arrived in the United States to attend the 4th Nuclear Security Summit, in which leaders of more than 50 countries will assess the threats of nuclear terrorism.We all know who created the terror networl worldwide and it is not the best place to speak peace and security,Mr,Prime Minister! 


Global terrorism has evolved over time and terrorists are now using modern technology and devices while national and international efforts to counter them have become outdated, Prime Minister Narendra Modi told a gathering of global leaders at a dinner.No security,no technolgy might ensure safety and peace until state nations address the grass root problems to delete the apps of dissidence resultant in clash. 


"All those leaders attending the Nuclear Summit and those who are interested in the world peace are urged to persuade both India and Pakistan to help resolve the Kashmir dispute for the sake of international peace and security," said Ghulam Nabi Fai, secretary general, World Kashmir Awareness.


Fai has served two years' imprisonment in the US on the charges of working on behalf of Pakistan's ISI.


Had the Indian Prime Minister who is attending 4th global nucear summit addressed the dissidents with this gesture we could have considered it a positive initiative and would also consider RSS ploy to share share governance in Kashmir as an initiative to include tahat part of India into the mainstream.It did not happen.


Prime Minister Narendra Modi met the members of the Indian community in Washington today, where he reached late in the night from Brussels. 


But he failed to address the grieved,persecuted,deprived,uprooted humanity at home.He seems rather more responsible to Indian communities abroad and does not mind whatever waits for those for whom he promised good days ahead and those poor fellows have to opt for suicide or insurrection as rule of law is absent in most part of India and India has been limited within the National Capital Zone.Every other part of India is far away from New Delhi.


Diplomatic sources did not rule out the possibility of a bilateral meeting with President Obama but no details of other meetings that Mr. Modi may have on his first day in Washington were available. He has met US President so many times after his VISA is cleared after Gujarat Genocide but he has no time to meet the people of India anywhere anytime and his Mon key Baaten is considered enough for discourse.


Every other type of discourse is rather banned or restricted,


Thus, Kshmir dissidents cry in Washington as crying in India is branded as sedition.


However,it is known that India and the US discussed ongoing counter-terrorism cooperation in the lead up to Prime Minister Narendra Modi's arrival on Thursday for the Nuclear Security Summit. 



"Terrorism is globally networked. But, we still act only nationally to counter this threat," Modi said at a working dinner hosted by President Barack Obama Thursday night to kick off the two-day Nuclear Security Summit.


"Nuclear security must remain an abiding national priority and all states must completely abide by their international obligations," Modi told the world leaders meeting in the shadow of Brussels and Lahore terror attacks. .


"Without prevention and prosecution of acts of terrorism, there is no deterrence against nuclear terrorism," he warned lamenting that while "the reach and supply chains of terrorism are global, genuine cooperation between nation states is not".


Obama, who is hosting his fourth and last such summit to discuss how to prevent terrorists and other non state actors from gaining access to nuclear materials, was flanked by Modi to the right and Chinese President Xi Jinping on the left.


The "dinner table" ran along the circumference of the East Room of the White House. In the middle were three big boxes of flowers, according to a pool report.


Modi, who has come to Washington after attending the India-EU summit in the Belgian capital, said: "Brussels shows us how real and immediate is the threat to nuclear security from terrorism.


"Terror has evolved. Terrorists are using 21st century technology. But our responses are rooted in the past," he said asking the leaders to focus on three contemporary features of terrorism.


"First, today's terrorism uses extreme violence as theatre. Second, we are no longer looking for a man in a cave, but we are hunting for a terrorist in a city with a computer or a smart phone.


"And third, state actors working with nuclear traffickers and terrorists present the greatest risk."


By putting spotlight on nuclear security, Obama has done great service to global security, Modi said and "this legacy of President Obama must endure".


Earlier, in an opinion piece in the Washington Post on Thursday Obama said: "Of all the threats to global security and peace, the most dangerous is the proliferation and potential use of nuclear weapons."


Outlining how to make the vision of a world without nuclear weapons a reality, he wrote: "We're clear-eyed about the high hurdles ahead, but I believe that we must never resign ourselves to the fatalism that the spread of nuclear weapons is inevitable."


"Even as we deal with the realities of the world as it is, we must continue to strive for our vision of the world as it ought to be," Obama wrote.


Secretary of State John Kerry and Secretary of Energy Ernest Moniz co-hosted a separate working dinner for other members of the visiting delegations.


"In recent years, 13 countries, plus Taiwan, have given up weapons-usable plutonium and highly-enriched uranium entirely," Kerry noted. "An additional 12 countries have decreased their stockpiles of nuclear material."


Since 2009, through various lines of effort, we have removed or eliminated enough weapons-grade fissionable material to supply nearly 7,000 nuclear bombs," he said.


India and other participating nations will present their national progress reports on steps taken by them to strengthen nuclear security since the last summit on Friday.


The first of these biennial nuclear security summits was held in Washington in April 2010 followed by the summits in Seoul in March 2012 and The Hague in March 2014.

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दुर्घटना की जिम्मेदारी से बचने के लिए परियोजना शुरु करने का श्रेय वाम शासन को दे दिया दीदी ने। उन्हींके आदेश से कोलकाता में मतदान से पहले शहर के सबसे व्यस्त और भीड़भाड़ वाले इलाके को चीरकर सेंट्रल एवेन्यू को 2.2 किमी लंबे इस फ्लाईओवर को हावड़ा ब्रिज से किसी भी कीमत पर पूरा करके चालू कर देने के फैसले की वजह से हुई इस दुर्घटना के कारण पहलीबार किसी परियोजना का श्रेय दीदी ने कट्टर दुश्मन वाममोर्चा की पूर्ववर्ती सरकार को दे डाला वरना उनका तो दावा यही है कि चार साल में उनने चारसौ साल का विकास कर डाला।उनका बस चलता तो वे हावड़ा ब्रिज,विक्टरिया मेमोरियल और फोर्ट विलियम भी अपने नाम कर लेतीं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने तो इससे बड़ा सनसनीखेज खुलासा किया है कि छेका जिसको मिला ,काम उसके बजाय सब कंट्राक्ट पर कई और स्थानीय छोटे बडे ठेकेदार कर रहे थे और ये तमाम बेनामी कंपनियों के मालिक तृणमूल कांग्रेस के नेता हैं। अब कोलकाता ने इस विकास से बहते जिस खून को देखा है,वही खून फिर बाकी जगह भी लोगों को दीखने लगे तो समझ में आयेगी कि इस मुक्तबाजारी विकास का असली चेहरा फिर बिल्डर, प्रोमोटर,सिंडिकेट,

दुर्घटना की जिम्मेदारी से बचने के लिए परियोजना शुरु करने का श्रेय वाम शासन को दे दिया दीदी ने।


उन्हींके आदेश से कोलकाता में मतदान से पहले शहर के सबसे व्यस्त और भीड़भाड़ वाले इलाके को चीरकर सेंट्रल एवेन्यू को 2.2 किमी लंबे इस फ्लाईओवर को हावड़ा ब्रिज से किसी भी कीमत पर पूरा करके चालू कर देने के फैसले की वजह से हुई इस दुर्घटना के कारण पहलीबार किसी परियोजना का श्रेय दीदी ने कट्टर दुश्मन वाममोर्चा की पूर्ववर्ती सरकार को दे डाला वरना उनका तो दावा यही है कि चार साल में उनने चारसौ साल का विकास कर डाला।उनका बस चलता तो वे हावड़ा ब्रिज,विक्टरिया मेमोरियल और फोर्ट विलियम भी अपने नाम कर लेतीं।


प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने तो इससे बड़ा सनसनीखेज खुलासा किया है कि छेका जिसको मिला ,काम उसके बजाय सब कंट्राक्ट पर कई और स्थानीय छोटे बडे ठेकेदार कर रहे थे और ये तमाम बेनामी कंपनियों के मालिक तृणमूल कांग्रेस के नेता हैं।



अब कोलकाता ने इस विकास से बहते जिस खून को देखा है,वही खून फिर बाकी जगह भी लोगों को दीखने लगे तो समझ में आयेगी कि  इस मुक्तबाजारी विकास का असली चेहरा फिर बिल्डर, प्रोमोटर,सिंडिकेट,माफिया के साथ सत्ता का अधबना ढहता हुआ फ्लाईओवर है।

एक्सकैलबर स्टीवेंस विश्वास

हस्तक्षेप

बंगाली राष्ट्रीयता के सर्वकालीन श्रेष्ठ आइकन रवीन्द्र नाथ ठाकुर के जन्मस्थल जोड़ासांको की नाक पर कोलकाता के व्यवसाय के केंद्र बड़ाबाजार,मुख्य सड़क सेंट्रल एवेन्यू और हावड़ा को सीधे निकलने के रास्ते पर गुरुवार को दिनदहाड़े अधबना फ्लाईओवर जब गिरा,तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले चरण के मतदान के जंगल महल इलाके में चुनाव प्रचार को निकली थी।


जैसी कि उनकी बहुत अच्छी आदत शुरु से है.उनने सबकुछ पीछे छोड़ दिया और खड़गपुर से हेलीकाप्टर में उड़कर कोलकाता पहुंच गयी।वही ब्रांडेड हवाई चप्पल और साड़ी में लिपटी।


इससे पहले मृतकों और घायलों को अनुदान की घोषणा उनने कर दी थी।दुर्घटना के तीन घंटे के भीतर कोई आधिकारिक बचाव और राहत अभियान कोलकाता में सेना के पूर्वी कमान के मुख्यालय, पुलिस मुख्यालय,चुनाव की वजह से केंद्रीय वाहिनी की मौजूदगी,आपदा प्रबंधन कार्यालय वगैरह वगैरह होने के बावजूद शुरु हुआ नहीं था।


मुख्यमंत्री ने मौके पर पहुंचते ही सबसे पहले यही कहा कि यह फ्लाई ओवर तो वाम जमाने का है और 2009 से बन रहा है।


जाहिर है कि इस दुर्घटना की जिम्मेदारी वाम शासन पर डालकर अपनी सरकार की जिम्मेदारी से उनने सबसे पहले पल्ला झाड़ लिया।


चुनाव अधिसूचना जारी होने से पहले छपे अखबारों के विज्ञापनों से लदे फंदे पन्नों पर गौर करें तो देखा जा सकता है कि वाम जमाने की शुरु और अधूरी सारी परियोजनाओं का श्रेय अकेले ममता बनर्जी ने लेने में कोई कोताही नहीं की।


पहले से जिन परियोजनाओं का शिलान्यास हो चुका है,नये सिरे से उनका शिलान्यास कर दिया गया।वाम जमाने में पूरी हो चुकी परियोजनाओं पर अपनी नाम पट्टी लगवाने में और बंगाल के अभूतपूर्व विकास का नक्शा पेश करने में वाम का नामोनिशां मिटाने में उनने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।


यह हैरतअंगेज है कि उन्हींके आदेश से कोलकाता में मतदान से पहले शहर के सबसे व्यस्त और भीड़भाड़ वाले इलाके को चीरकर सेंट्रल एवेन्यू को 2.2 किमी लंबे इस फ्लाईओवर को हावड़ा ब्रिज से किसी भी कीमत पर पूरा करके चालू कर देने के फैसले की वजह से हुई इस दुर्घटना के कारण पहलीबार किसी परियोजना का श्रेय दीदी ने कट्टर दुश्मन वाममोर्चा की पूर्ववर्ती सरकार को दे डाला वरना उनका तो दावा यही है कि चार साल में उनने चारसौ साल का विकास कर डाला।


उनका बस चलता तो वे हावड़ा ब्रिज,विक्टरिया मेमोरियल और फोर्ट विलियम भी अपने नाम कर लेतीं।


जिस संस्था को पीपीपी माडल के तहत इस निर्माण का ठेका दिया गया,आईवीआरसीएल नामक वह संस्था रेलवे की काली सूची में रही है और जिस समय यह फ्लाईओवर का निविदा तय हुआ,उससे पहले बतौर रेलमंत्री उन्हें इसकी जानकारी होनी चाहिए थी।


फिर इस निर्माण की देखरेख की जिम्मेदारी कोलकाता नगर निगम और राज्य सरकार दोनों की थी।


परियोजना वोट से पहसे पूरी हो जाये और इसका श्रेय लेकर कोलकाता जीत लिया जाये,इसकी तो बड़ी जल्दी और फिक्र थी,लेकिन इस परियोजना को कैसे अंजाम दिया जा रहा है,इसकी कोई निगरानी नहीं की गयी।


विकास का दावा करने वाली सरकार दोबारा जनादेश का दावा कर रही है और ऐन चुनाव से पहले हुई दुर्घटना की जिम्मेदारी से बचने के लिए 2009 के ठेके का हवाला दे रही है।


प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने तो इससे बड़ा सनसनीखेज खुलासा किया है कि छेका जिसको मिला ,काम उसके बजाय सब कंट्राक्ट पर कई और स्थानीय छोटे बडे ठेकेदार कर रहे थे और ये तमाम बेनामी कंपनियों के मालिक तृणमूल कांग्रेस के नेता हैं।


गौरतलब है कि कोलकाता नगर निगम के मेयर से लेकर बंगाल के नगर विकास मंत्री तक नारद स्टिंग में काम के लिए घूस लेते दिखाये गये हैं और इस प्रकरण की कोई जांच भी नहीं हो रही है।


अधीर चौधरी के मुताबिक कोलकाता में इतना बड़ा हादसा हो गया और मौके पर पहुंचे ही नहीं शहरी विकास मंत्री।


उनकी हिम्मत ही नहीं हुई।


कोलकाता में निजी मकान बनाने का काम भी अब प्रोमोटर करते हैं।क्योकि सरिया, ईंट,सीमेंट,रेत से लेकर बांस,मिट्टी,पानी तक सारी निर्माण सामग्री सिंडेकेट से लेनी होती है और ये सारे सिंडिकेट सत्तादल के होते हैं और निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और दाम पर कोई सवाल करने की हिम्मत कोई कर ही नहीं सकता।


पूरा कोलकाता और कोलकाता से जुड़े सारे उपनगरों और जिला शहरों से लेकर प्रस्तावित बंदरगाह सागरद्वीप तक इन्हीं बिल्डरों,प्रोमोटरों और सिंडिकेटों का अबाध राज है।जो सारे के सारे सत्ता दल के साथ जुडे होते हैं।


अधबने फ्लाईओवर के मलबे से निर्माण सामग्री का नमूना फोरेंसिक जाच के लिए गया है और लाशों की कुल गिनती 24 तक पहुंची है औ जख्मी भी कुल 89 बताये जा रहे हैं।


मौके पर हाजिर मीडिया ने देखा और दिखाया कि जो हिस्सा गिरा ,उसकी ढलाई पिछली रात को हुई थी और ढलाई के लिए सीमेच नदारद थी।मलबे में रेत ही रेत मिला है।


हाल यह है कि जिन खंभों के भरोसे अभी गिरने से बचा फ्लाई ओवर खड़ा है,वे उसके नीचे फंसी दो गाड़ियों के हारे खड़ी है और उन गाडडियों में भी लाशें हैं,लेकिन बचाव कर्मी उन्हें तुरंत निकाल नहीं सकते वरना अधबने फ्लाईओवर का बाकी हिस्सा भी भरभराकर गिर जाने का अंदेशा है।


क्या मां माटी मानुष की सरकार अंधे कानून की तरह अंधी है कि मुख्यमंत्री से पहले रेलमंत्री होने के बावजूद दीदी को 2009 के बाद अब उस दागी निर्माण संस्था के दामन में दाग दीख रहे हैं,जिसे हैदराबाद में बी काली सूची में डाला गया है और रेलवे में भी वह काली सूची में है?


कोलकाता में वाम दलों का सूपड़ा साफ ही है जब से परिवर्तन हुआ और सारे एमएलए,सारे एमपी और काउंसिलर तक सत्तादल के हैं,जिनके मधुर ताल्लुकात बिल्डर प्रोमोटर सिंडिकेट राज से है कहवने से बेहतर यह कहना शायद उचित होगा कि वे ही उनकी सत्ता और ताकत के मौलिक स्रोत हैं तो आ. के स्रोत भी वे ही हैं।


मान लेते हैं कि सारे आरोप बेबुनियाद है लेकिन उनकी जनप्रतिबद्धता और नुमाइंदगी और रहनुमाई का तकाजा तो यह था कि उनकी नाक के नीचे कोलकाता के सबसे कमाउ,सबसे बिजी इलाके में निर्माणके नाम पर आम जनता की जान माल के साथ पिछले चार पांच साल से जो खेल होता रहा है,उसपर उनकी निगरानी ही न हो।


इसके बाद यह खबर एकदम बेमानी है कि निर्माण संस्था इस दुर्घचना को दैवी प्रकोप बता रही है,जो शायद देर तक चलने वाली जांच पड़ताल से साबित हो भी जाये।


कोलाकाता शहर का भूगोल वैसे ही जराजीर्ण है और उसकी हालत खुले बाजार की बूढ़ी वेश्या जैसी है जिसका रंगरोगण गिराहक पटाने के लिए किया जा रहा है।


वैसे ही अंधाधुंध शहरीकरण को एकमुश्त विकास और औद्योगीकरण मान लेने का यह पीपीपी माडल का चरित्र सर्वकालीन और सर्वव्यापी है,जिनपर स्मार्ट शहर का तमगा अच्छे दिनों के क्वाब के साथ टांगा जाना है।


अब कोलकाता ने इस विकास से बहते जिस खून को देखा है,वही खून फिर बाकी जगह भी लोगों को दीखने लगे तो समझ में आयेगी कि  इस मुक्तबाजारी विकास का असली चेहरा फिर बिल्डर,प्रोमोटर,सिंडिकेट,माफिया के साथ सत्ता का अधबना ढहता हुआ फ्लाईओवर है।



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Top trending from Bangladesh #Defeat Mamata#Bangladesh wants no more Excalibur Stevens Biswas HASTAKSHEP

Top trending from Bangladesh #Defeat Mamata#Bangladesh wants no more

Excalibur Stevens Biswas

HASTAKSHEP

The democrat and secular forces have been fighting against fascism in Bangladesh. 


Bangladesh Dalit Movement comprises of SC,ST,OBC,Minorities,intelligentsia,communists and left and secular forces.It demands to hang Jammat and RSS to be hanged with the same rope.It expresses solidarity of the deprived and deprived and exploited working class.


Bangladesh never voiced its opinion in West Bengal political affairs since its birth.


But Mamata Modi alignment and RSS JAMAT BNP alliance though never confirmed,have irritated the democrat and secular forces as never before.


Mind you Bangladesh secular and democrat forces have sacrificed in millions to uphold Bengali nationalism and Bengali language since the historical fight for freedom era which has intensified as persecution of minorities continue even after independence.


But they united with unprecedented Shahbagh movement and ensured that all the war criminals against humanity and nature should be hanged and the hanging continues even as Islam is declared as national religion religion.They have united as never before.


Having said that it should be understood why the persons like Mohsin who belongs to Bangladesh Intelligentsia tries to intervene in West Bengal politics.


Simply the trending #Defeat Mamata means that those fighting for Bengali Nationalism,Bengali language,secular and democrat forces have singled out Mamata Banerjee as the greatest danger for Bengalies across the border.


Never before in History any Indian leader had to face such a campaign!


Well,it might not change the mandate at home!But this campaign justifies the logic of democrate and secular front to defeat Mamata aligned with RSS as it is very dangerous for Bengali nationalism also as it is threating the idea of India!





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Re: लेख

दरकार एक अदद 'स्पेस' की…

मुकेश कुमार साहू

युवा पत्रकार

अभी कुछ दिनों से देख रहा हूं कि लोगों को किसी के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने के लिए हर कदम पर प्रमाण देने की आवश्यकता पड़ रही । कभी तो सच्चे देशभक्त प्रमाण दो तो कभी सच्चे हिन्दु होने का। यहां तक कि सच्चे मुस्लमान होने का भी। इसके अलावा अन्य के प्रति भी जिनमें व्यक्तियों के बीच आपस के संबंध हो । यदि आप प्रमाण नहीं देते तो आप देशद्रोही या अन्य करार दिए जाते हैं। हाल के घटनाक्रमों से कुछ ऐसा ही जाहिर हो रहा है। इसे साजिश कहें या कुछ और...। कई बार लगता है कि इसकी तुलना में कई मुख्य और ज्वलंत मुद्दों पर से लोगों का ध्यान हटाने के लिए ऐसा किया जाता है। पर इस तरह कि गतिविधियां तो देश व समाज में लोगों के बीच का स्पेस ही खत्म कर रही है, जिस 'स्पेस' में नये विचारों और विभिन्नताओं को पल्लवित होने मौका मिलता है । ऐसा लग रहा है कि दुनिया एक ' हार्ड एंड फास्ट रूल ' पर टिकी है और इसी से संचालित होती है। जबकि वास्तविकता में तो ऐसा हो ही नहीं सकता। क्योंकि प्रकृति भी तो नये पौधों, लताओं और पुष्पों को पल्लवित होने का 'स्पेस' प्रदान करती है। इसी से ही तो वो बहुत खूबसूरत लगती है और जिसे देखने पर आंखों व दिल को सुकुन मिलता है।

  हाल ही में मैं अलग-अलग जगह के बहुत से लोगों से मिला और मिल भी रहा हूं तो मैंने पाया कि अब यह प्रवृत्ति लोगों के व्यवहार में आने लगा है जो अब उनकी लाइफ स्टाइल से जुड़ती जा रही है। जो कि चिंतनीय है। क्योंकि वास्तविक जीवन में तो एक स्पेस की दरकार हमेशा से बनी रहती है जहां नये विचार और जीवन में एक नयापन पल्लवित हो साथ ही कुंठाएं नष्ट हो । यदि ऐसा न हुआ तो ये कुंठाएं ही घर कर जाएंगी।

  यूं तो हमारे साइबर वर्ल्ड की दुनिया को वर्चुअल (आभासी) दुनिया की संज्ञा दी जाती है पर अब यह उस तरह से आभासी नहीं रहा। क्योंकि अब तो खासकर युवा जो इस दुनिया का दीवाना भी है और कर्ता-धर्ता भी। जहां स्पेस तो है अपनी बातों व विचारों को कहने का, पर नहीं है तो ज्यादातर के पास सिर्फ सही विवेक के साथ विचारशील, तर्कशील और आधुनिक समुन्नत समाज बनाने की दृष्टि। चूंकि अब तो इस आभासी दुनिया तेजी से युवाओं के बीच पैर पसार रही है और जिनका असर अब समाज में दिखने लगा है । कहीं कहीं तो यह लोगों के बीच आपसी वैमनस्य को इस हद तक बढ़ा दे रही है कि लोग एक-दूसरे को मरने-मारने लग जाते हैं। जिसकी परिणति कभी दादरी तो कभी शटडाउन जेएनयू में नजर आती है। यदि एक अदद 'स्पेस' हम अपने समाज लेकर व्यक्तिगत संबधों के बीच रहे तो कुंठाएं शायद पनपे ही न, साथ ही नये विचारों व और भी नई चीजों को पल्लवित होने का मौका मिले व पल्लवित हों भी।



2016-04-01 11:17 GMT+05:30 MUKESH KUMAR SAHU <mukesh.ksahu10@gmail.com>:
डियर पलाशदा
               नमस्कार
मैंने राष्ट्रवाद पर एक आर्टिकल लिखा था जिसका जिक्र मैं आपसे संभावना संस्थान में कर रहा था उसे मैं आपके पास मेल कर रहा हूं।
धन्यवाद!
आपका
मुकेश कुमार
मो. 9582751771



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