Saturday, January 16, 2021

Agriculture markets laws are illegitimate, unconstitutional, must be repealed.

More than 50 days have passed since the farmers' protest started at Delhi's borders. Farmers have burnt the copies of the three agriculture market laws- Agriculture Produce Market Committee (APMC) Bypass law, Contract Farming law and decriminalization of commodity hoarding law. They are gearing up for a tractor rally in Delhi on Republic Day demanding repeal of these illegitimate unconstitutional laws. 

At a Dialogue on Farm Market Laws in Patna, P. Sainath, noted journalist observed, "Agriculture is a state subject under the Constitution of India. These three laws aggravate the existing agrarian crisis. They should be repealed. The government is playing with fire." He added, "APMC is to agriculture what the government school is to the education sector and APMC is like the government hospital of the health sector. Reforms must be farmer friendly, and not corporate friendly.” He demanded a special session of Parliament for hearing the farmers and addressing their demands in the context of unprecedented mobilization of farmers on the issue of the farm market bills. Sainath explained how the farmers are directly confronting the corporate power- “Their protest is in defence of democracy and for reclaiming the republic”. He questioned the enactment of these laws during the pandemic. He explained the many aspects of the agrarian crisis, and how many allied professions have been affected by it and the importance of Minimum Support Price, and how it must be related to procurement. He concluded saying, “This is one of the series of struggles, the nation is with the farmers and this fight is ours, we need to show our solidarity with the mobilization of farmers because it is not an ordinary event. It merits special attention of all sections of society because these laws will have adverse effect on the rights of all the citizens."

Dr. Gopal Krishna of Nation for Farmers introduced the subject and explained the backdrop in which Bihar's APMC Act was repealed because of irrational and unconvincing reasons and made a case for its restoration. He said, Patna High Court erred in dismissing the petition challenging the repeal of Bihar's APMC Act, 2006 in 2008. Justice Rajesh Balia was misled by the then Advocate General of Bihar. It was admitted in the Court by the State Government that no studies were conducted to find out the achievements of Bihar's APMC Act before reaching the conclusion that the law had failed to achieve its purpose. Notably, the 23-page long verdict has cited International trade agreements to endorse the constitutionality of the repeal law. The fact remains the repeal of Bihar's APMC Act is illegitimate and is contrary to the principles of constitutionalism. There is a compelling reason to ensure restoration of this law. Similar law has been enacted in Maharashtra in 2015 to safeguard the interest of the farmers. 

 

तीनों कृषि बाजार कानून नाजायज और असंवैधानिक हैं: पी साईनाथ

केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले 50 से अधिक दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर किसान प्रदर्शन कर रहे हैं. किसानों ने नए कृषि कानूनों की प्रतियां जलाईं. साथ ही गणतंत्र दिवस के मौके पर 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड करने का ऐलान किया है. किसानों की मांग है कि तीनों कृषि कानूनों को निरस्त किया जाना चाहिए. उन्होंने कोरोना वायरस महामारी के दौरान इन कानूनों को पारित करने का केंद्र सरकार के फैसले पर सवाल उठाया है। किसान डटे हुए हैं और केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। इन कानूनों के जरिये सरकार एपीएमसी मंडियां और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) खत्म करना चाह रही हैजिसके चलते उन्हें ट्रेडर्स और बड़े कॉरपोरेट के रहम पर जीना पड़ेगा। ये कानून किसानों को कोई कानूनी सुरक्षा नहीं प्रदान करते हैं. किसान संगठन अपनी इस मांग को लेकर प्रतिबद्ध हैं कि सरकार को हर हालत में इन कानूनों को वापस लेना होगा. इस संबंध में सरकार और किसानों के बीच बातचीत के कई दौर चलेलेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है।  

कृषि बाजार कानूनों को लेकर देश के किसानों के अप्रत्याशित व्यापक जुटान के सन्दर्भ में आज पटना में जाने माने कृषि विशेषज्ञ एवं मेग्सेसे पुरस्कार विजेता श्री पी साईनाथ के साथ चर्चा का आयोजन हुआ। ज्ञात हो कि श्री साईनाथ पीपुल्स अरकाईव ऑफ रूरल इंडिया (PARI) के संस्थापक हैं और द हिन्दू अखबार के ग्रामीण मामलों के संपादक रहे हैं. 

उन्हीने कहा कि भारतीय संविधान के तहत कृषि राज्य का विषय है. केंद्र द्वारा इन कानूनों को बनाना असंवैधानिक है. इससे मौजूदा कृषि संकट को और गहरा देगा। इन कानूनों को रद्द किया जाना चाहिए. सरकार आग से खेल रही है". साईनाथ ने कहा कि कृषि उत्पाद बाजार समितिकृषि के लिए लगभग वही है जो सरकारी स्कूल शिक्षा के क्षेत्र के लिए है या फिर जो सरकारी अस्पताल स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए है. कृषि कानूनों में नीतिगत सुधार निश्चित तौर पर किसानों के हित को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिएन कि निजी कंपनियों के हित में। 

इन कानूनों के जरिये सरकार एपीएमसी मंडियां और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) खत्म करना चाह रही हैजिसके चलते उन्हें ट्रेडर्स और बड़े कॉरपोरेट के रहम पर जीना पड़ेगा। ये कानून किसानों को कोई कानूनी सुरक्षा नहीं प्रदान करते हैं. किसान संगठन अपनी इस मांग को लेकर प्रतिबद्ध हैं कि सरकार को हर हालत में इन कानूनों को वापस लेना होगा. इस संबंध में सरकार और किसानों के बीच बातचीत के कई दौर चलेलेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है।  

नेशन फॉर फार्मर्स के डा गोपाल कृष्ण ने चर्चा के विषय का परिचय दिया। उन्होंने यह भी बताया की कैसे बिहार के सन्दर्भ में  APMC एक्ट को गैर वाजिब वजह से निरस्त किया गया और इस एक्ट को फिर से बहाल करने के महत्व पर जोर दिया। 

मालूम हो कि केंद्र सरकार की ओर से कृषि से संबंधित तीन विधेयक– किसान उपज व्‍यापार एवं वाणिज्‍य (संवर्धन एवं सुविधा) विधेयक, 2020, किसान (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) मूल्‍य आश्‍वासन अनुबंध एवं कृषि सेवाएं विधेयक, 2020 और आवश्‍यक वस्‍तु (संशोधन) विधेयक, 2020 को बीते 27 सितंबर को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी थीजिसके विरोध में किसान प्रदर्शन कर रहे हैं. सरकार समझ रही थी कि यदि वो इस समय ये क़ानून लाती है तो मज़दूर और किसान संगठित नहीं हो पाएंगे और विरोध भी नहीं कर पाएंगेलेकिन उनका यह आकलन ग़लत साबित हुआ है. किसानों को इस बात का भय है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दिलाने की स्थापित व्यवस्था को खत्म कर रही है और यदि इसे लागू किया जाता है तो किसानों को व्यापारियों के रहम पर जीना पड़ेगा. किसानों का व्यापक जुटान कोई मामूली जुटान नहीं है.


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